इक़बाल रज़ा की कलम से: शब ए बारात क्या है?

इक़बाल रज़ा की कलम से: शब ए बारात क्या है?

हम सब जानते हैं कि अल्लाह(swt) तमाम कायनात (Universe) का रब है और इसके क़वानीन भी एक(Universal) है जो सिर्फ इस्लाम है। इस्लाम इंसानियत को बचाने के लिए अल्लाह(swt) का चुना हुआ मज़हब है, जिसकी बुनियाद तौहीद है जो इंसानी ज़िन्दगी को रौशन करती है। आलमे इस्लाम अल्लाह(swt) का शुक्रगुज़ार है इस बात के लिए कि इस्लाम की एकरूपता (Universality) ही इसकी रूह है जो दुनिया की किसी मज़हब में नहीं है।

इसी खूबी की वजह से पूरी दुनिया में मुस्लिमों को आपस में एक-दूसरे से जुड़ना आसान बनाता है क्योंकि ये सभी इस्लाम द्वारा लाए गए मूल सांस्कृतिक मूल्यों (Basic cultural values) को साझा करते हैं। फिर भी, कुछ ऐसे रिवायात हैं जिन पर इस्लाम के अलग-अलग ख़्याल (School of thoughts) आपस में असहमत हैं। इस तरह के रिवायात में शाबान की 15वीं रात की इबादात भी है, जिसे ‘शब ए बारात’ के नाम से भी जाना जाता है। अरब दुनिया में यह Laylat-ul-Baraa या Laylatun Nisf के नाम से जानी जाती है।

‘शब ए बारात’ के मामले में कुरान की इस आयत पर अलग-अलग ख़्याल (School of thoughts) का अपना-अपना मत है।

“Verily, We have sent it (this Quran) down in the night of Al-Qadr.” (97:1)

ख़ैर, हर मुसलमान कमोबेश शाबान और ‘शब ए बारात’ की फ़ज़ीलत से वाक़िफ़ है। हमबली ख़्याल के ज़्यादातर विद्वान(scholars) इस रात के खास होने पर एकमत हैं। अहादीस व रिवायात से भी पता चलता है कि शाबान का महीना और यह रात अज़मत वाला है, खुद पैगंबर(saw) खासकर इसका ज़िक्र फ़रमाया करते थे।

मेरे इस ब्लॉग का मक़सद निहायत ही अदब व एहतेराम के साथ ईमानवालों (Believers) को अपील करना है कि आप की राय एक-दूसरे से अलग हो सकती है। मेरे नज़रिये से इसे इबादत की तरह लें और एक-दूसरे की क़द्र करते हुए पारस्परिक स्वीकार्यता (mutual acceptance) तक पहुंचें तो कोई मुद्दा न होगा क्योंकि आखिर में इससे मुस्लिम बंटते है और कमज़ोर होते हैं।

हम गवाह हैं इस सदी में हमारे सामने कैसे सभी गैर-मुस्लिम राष्ट्र व क़ौमें हमारे खिलाफ एकजुट हो गए हैं और सभी मुस्लिम राष्ट्र एक-एक कर टुकड़े-टुकड़े हो रहे हैं और नीचे जा रहे हैं। इस वक़्त पूरी दुनिया में इस्लामी एकता की सख्त ज़रूरत है क्योंकि सबसे प्रभावी हथियार इस्लामिक बिरादरी की एकता (Unity) है।

पैगंबर (saw) ने फ़रमाया, “हक़ीक़तन, ईमानवाले एक साख़ की तरह हैं, हर हिस्सा दूसरे को मजबूत कर रहा होता है,” और पैगंबर ने अपनी उंगलियों को एक साथ पकड़ लिया।[अल बुखारी]

अल्लाह (swt) भी कुरान में फरमाते हैं, “अल्लाह(swt) की रस्सी सब मिलकर मज़बूती से थाम लो, और आपस में न बंटों ।”[3:103]

“ईमानवाले आपस में भाई हैं”अल्लाह (swt।) हमें एकजुट (Unite) होने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

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