ईद उल अजहा की नमाज के एहकाम और मसायल

ईद उल अजहा की नमाज के एहकाम और मसायल
मौलाना मुफ्ती मोहम्मद रफअत कासमी : छोटे मौजो में जुमा और ईदैन की नमाज पढ़नी मकरूह तहरीमी है अलावा इसके बड़े मौजो में जहा जुमा व ईदैन की नमाज जायज है वहां तनहा नमाज पढ़ना भी जायज नहीं है क्योंकि जुमा व ईदैन की नमाज के लिए शरायत हैं। त

मौलाना मुफ्ती मोहम्मद रफअत कासमी : छोटे मौजो में जुमा और ईदैन की नमाज पढ़नी मकरूह तहरीमी है अलावा इसके बड़े मौजो में जहा जुमा व ईदैन की नमाज जायज है वहां तनहा नमाज पढ़ना भी जायज नहीं है क्योंकि जुमा व ईदैन की नमाज के लिए शरायत हैं। तमाम शर्तों में एक शर्त जमाअत भी है, तनहा-तनहा जायज नहीं है। जुमा व ईदैन में बुलंद आवाज से किरात करना वाजिब है और तरावीह में भी वाजिब है।

ईदैन के दिन तेरह चीजें मसनून हैं:- 1. शरअ के मुवाफिक अपनी आराइश 2. गुस्ल करना, 3. मिसवाक करना, 4. उम्दा से उम्दा कपड़े (नए या द्दुले हुए) जो अपने पास मौजूद हो पहनना, 5. खुशबू लगाना, 6. सुबह को बहुत सवेरे उठना, 7. ईदगाह में सवेरे सवेरे जाना, 8. ईदगाह जाने पहले कोई मीठी चीज जैसे छुआरा वगैरह खाना, 9. ईदगाह जाने से पहले सदका-ए-फित्र दे देना, 10. ईद की नमाज ईदगाह में जाकर पड़ा यानी शहर की मस्जिद में बिला उज्र न पढ़ना, 11. जिस रास्ते से जाए उसके सिवा दूसरे रास्ते से वापस आना 12. पैदल जाना, 13. रास्ते में तकबीर तशरीक ईद उल फित्र में द्दीमी आवाज से पढ़ते हुए जाना चाहिए।

ईद अल अजहा में नमाज से पहले न खाना मुस्तहब है चाहे कुर्बानी करे या न करे और ईदगाह में जाते वक्त रास्ते में बुलंद आवाज से तकबीर कहना मसनून है। ईदैन की रात में जाग कर इबादते इलाही और दरूदशरीफ और तिलावते कलाम पाक करते रहना मुस्तहब है और ईदैन के दिन खुशबू लगाना और अपने को आरास्ता (साफ सुथरा) करना मुस्तहब है लेकिन औरतें अगर ईद के दिन नमाजे ईद को जाना चाहें तो उनके लिए यह बातें मुस्तहब नहीं हैं क्योंकि इससे फितना पैदा होने का अंदेशा है।

अगर उन्हें जाना न हो तो मजकूरा बाते उनके लिए भी मुस्तहब है। जिस तरह उन लोगों के लिए मुस्तहब हैं जो ईद की नमाज को न जाएं क्योंकि आरास्ता करना ईद के दिन के लिए मुस्तहब है, नमाजे ईद के लिए नहीं। हनफिया के नजदीक यह बातें मुस्तहब नहीं हैं बल्कि सुन्नत है। मर्द व औरत अपने बेहतरीन लिबास पहने चाहे वह नए हों या इस्तेमाल में आ चुके हैं लिबास का रंग सफेद हो या सफेद न हो इस पर भी सबका इत्तेफाक है।

ईद के दिन मुस्तहब यह है कि नाखून काट कर, बाल वगैरह बनाकर और मैल कुचैल दूर करके अपने को आरास्ता करे और मुस्तहब है कि नमाजे फजिर पढ़ने के बाद ही ईदगाह की जानिब जाने की जल्दी करें चाहे सूरज अभी न निकला हो यह हुक्म उसके लिए है जो इमाम न हो। इमाम के लिए मुस्तहब यह है कि ईदगाह जाने में ताखीर करे कि वहां पहुंचते ही नमाज के लिए खड़ा हो जाए और मजीद इंतजार न किया जाए। ईदगाह पैदल जाना मुस्तहब है और मुस्तहब यह है कि किसी मुसलमान से मिलना हो तो चेहरे पर खुशी और बशाशत का इजहार किया जाए और यह कि हस्बे मकदूर सदकात नाफिला की कसरत की जाए जिस पर फित्रा वाजिब है वह नमाजे ईद से पहले और नमाजे फजिर के बाद ही निकाल दे।

हजरत अबू सईद खुदरी (रजि0) से रिवायत है कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ईद उल अजहा के दिन ईदगाह तशरीफ ले जाते थे, सबसे पहले आप (सल0) नमाज पढ़ाते थे फिर नमाज से फारिग होकर लोगों की तरफ रूख करके खुतबा के लिए खड़े होते थे और लोग बदस्तूर सफों में बैठे रहते थे।
इस हदीस से मालूम हुआ कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का आम मामूल यही था कि ईदैन की नमाज आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना तैयबा की आबादी से बाहर उसी मैदान में पढ़ते थे जिसको आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस काम के लिए मुंतखब फरमा लिया था और गोया (ईदगाह) करार दे दिया था, उस वक्त उसके गिर्द कोई चार दीवारी भी नहीं थी, बस मैदान था लिखा है कि मस्जिदे नबवी से तकरीबन एक हजार कदम के फासले पर था। सुन्नते तरीक के मवाफिक शहर से बाहर नमाजे ईदैन अदा करना बेहतर है। इसमें फजीलत ज्यादा है बनिस्बत शहर में अदा करने के।

ईदगाह शहर से बाहर होना सुन्नते मोकिदा है क्योंकि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ईदैन की नमाज हमेशा बाहर अदा फरमाते थे बल्कि माजूरों को भी साथ ले जाने का एहतमाम फरमाते थे। सिर्फ एक बार बारिश की वजह से बाहर तशरीफ नहीं ले जा सके। इसलिए अस्ल हुक्म यही है कि ईदैन के लिए शहर से बाहर एक ही जगह इज्तिमा हो इसमें शौकते इस्लाम का मुजाहिरा भी है मगर बड़े शहरों से बाहर निकलना मुश्किल है इसलिए शहरों के अन्दर बड़े मैदान में या जरूरत के वक्त मस्जिद में अदा करना बिला कराहत दुरूस्त है लेकिन हर मुमकिन कोशिश लाजिम है कि हर मोहल्ले में छोटे छोटे इज्तिमाएं के बजाए एक बड़े मकाम पर बड़े इज्तिमा की कोशिश की जाए। ईद की नमाज के लिए ईदगाह जाना सुन्नते मोकिदा है बिला उज्र इसका छोड़ना लायके मलामत है और तर्क का आदी गुनहगार है, शहर से ईदगाह दूर होने की वजह से बूढ़े और बीमारों को तकलीफ होती तो उनके लिए मस्जिद में इंतजाम करने की फकहा ने इजाजत दी है।

हजरत अबू हुरैरा (रजि0) से रिवायत है कि एक बार ईद के दिन बारिश होने लगी तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हम को ईद की नमाज मस्जिदे नबवी में पढ़ाई ।

ईदैन में उम्मते मुस्लेमा का त्यौहार और दीनी जश्न होने की जो शान है उसका तकाजा यही है कि दुनिया की कौमों के जश्नों और मेलों की तरह हमारा ईदैन की नमाज वाला इज्तिमा भी कहीं खुले मैदान में हो, आप का आम मामूल और दस्तूर भी यही था। इसलिए आम हालात में यही सुन्नत है कि नमाजे ईदैन ईदगाह में ही हो। लेकिन हजरत अबू हुरैरा (रजि0) की इस हदीस से मालूम हुआ कि अगर बारिश की हालत हो (या ऐसा ही कोई और सबब हो) तो ईदैन की नमाज भी मस्जिद में पढ़ी जा सकती है।

हमारे यहां दस्तूर बन चुका है कि ईद की नमाज से पहले एक दिन आदमी मिम्बर के पास खड़े होकर जोर-जोर से तकबीर पढ़ते हैं उसके बाद हाजिरीन आवाज मिलाकर जवाब देते हैं, अस्ल मकसद यह है कि किसी की नमाज न रह जाए, तो क्या इसमें कोई हर्ज है? ईदगाह में बुलंद आवाज में इज्तिमाई तौर पर तकबीर का इल्तिजाम एक रस्म है। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और आप के खुलफा-ए-राशिदीन (रजि0) वगैरह हम सहाबा-ए-कराम (रजि0) के पैरू व ताबेईन और उनके फरमांबरदार तबा ताबेईन और उनके नक्शे कदम पर चलने वाले इमाम से यह साबित नहीं है। इसलिए शरई सबूत के बगैर दीन व शरीअत में खुद ईजाद कर्दा यह अमल रद्द और बातिल है। दीन किसी के ताबे नहीं, सब इसके ताबे हैं। किसी को दीन में कमी व बेशी का हक नहीं जिस तरह मंकूल और साबित हुआ उसी तरह अमल करना जरूरी है।

जुमा के दिन मिनारा पर अजान होती है मगर ईद के दिन नहीं होती कि मंकूल नहीं है। जुमा के खुतबे के वक्त अजान होती है मगर ईद के खुतबे के लिए अजान नहीं होती। इसलिए कि साबित नहीं है। जुमा की नमाज के लिए अकामत होती है मगर ईद की नमाज के लिए अकामत नहीं होती कि मंकूल नहीं है।

ईदगाह में नमाजे ईद से पहले हजरत अली (रजि0) ने एक शख्स को नफिल पढ़ने से रोका। उसने कहा कि यह नमाजे नफिल अजाब का काम तो नहीं फिर क्यों मना करते होे? हजरत अली (रजि0) ने फरमाया कि जिस काम के लिए नबी करीम (सल0) ने हुक्म न फरमाया हो और न उसकी तरगीब दी हो वह अज्र व सवाब का काम नहीं है। लिहाजा यह नमाज बेकार है और दीन में फुजूल काम हराम है और डर है कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत की खिलाफवर्जी पर अल्लाह तआला तुझे अजाब दें। लिहाजा आपके यहां जो रस्म है वह गलत है और खिलाफे सुन्नत है।

औरतों का नमाज के लिए ईदगाह जाने की इस फितने से भरे जमाने में इजाजत नहीं। बेशक फकहा इसका इंकार नहीं करते कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जमाने में औरतें नमाजे पंजगाना और ईदैन की जमाअत में हाजिर होती थीं लेकिन वह खैर का जमाना था, फितनों से महफूज था, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) खुद मौजूद थे, वहि का नुजूल होता था, नए-नए एहकाम आते थे, नए मुसलमान थे, नमाज रोजे वगैरह के एहकाम सीखने की जरूरत थी और सबसे बढ़कर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इक्तिदा में नमाज अदा करने का शर्फ हासिल होता था।

नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ख्वाब की ताबीर बयान करते थे और अजीब व गरीब उलूम का इंकशाफ फरमाते थे उनको हाजिरी की इजाजत थी लेकिन यह कहना कि मर्दों की तरह औरतों को हाजिरी का हुक्म ताकीदी था, यह सही नहीं। औरतों के लिए मर्दों की तरह जमाअत जरूरी नहीं थी। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का फरमान है कि औरतों की सबसे बेहतरीन मस्जिद उनके घर की गहराई है (यानी सबसे ज्यादा बंद और तारीक कोठरी)।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने औरतों की कोठरी की नमाज को मस्जिदे नबवी की नमाज से कहीं अफजल बताया। इसमें ईदैन को अलग नहीं किया गया है। मस्जिदें घरों से करीब होती हैं फिर घर की नमाज अफजल है और ईदगाह तो शहर से बाहर और दूर होती है, दूसरे यह कि नमाजे पंजगाना व जुमा फर्ज है जबकि इसके लिए मस्जिद में आना अफजल नहीं तो ईदैन की नमाज में हाजिर होना क्योंकर अफजल होगा। वक्ती तौर पर मसलेहतन नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने औरतों को ईदगाह में जमा फरमाया था इससे वाजिब व इस्तहबाब साबित नहीं हो सकता।

आजकल फतवा इस पर है कि तमाम नमाजों में औरतों का जाना चाहे दिन की हो या रात की जवान हो या बूढ़ी दोनों के लिए मना है। जमाअत के लिए औरतों का मस्जिद में आना इस जमाने में मकरूह है क्योंकि फसाद व फितने का खतरा है। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जमाने में निकलने की इजाजत शरीअत की तालीम हासिल करने की गरज से थी और अब वह गरज बाकी नहीं है। इसलिए कि शरीअत के एहकाम आजकल आमतौर पर शाया हैं और औरतों का पर्दा में रहना मुनासिब और बेहतर है। यह हुक्म आम है, हरम शरीफ हो या मस्जिदे नबवी, हिन्दुस्तान हो या अरब सबके लिए यही हुक्म है। लिहाजा औरतों की इज्जत, आबरू व ईमान की हिफाजत इसमें है कि ईद की नमाज के लिए भी न निकलें।

खुतबा-ए-हज्जतुल विदा

आज से पन्द्रह सौ साल पहले अरफात के मैदान में नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जो आखिरी खुतबा दिया और जिसे खुतबतुल विदा कहा जाता है वह रहती दुनिया तक दुनिया भर के इंसानों के हुकूक व फरायज का अलमगीर मंशूर है। ऐसा मंशूर जिसमें किसी किस्म की कमी बेशी नहीं की जा सकती। यह खुतबा आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अल्लाह के हुक्म से दिया था।

उस खुतबे में वह सब कुछ है जो एक इंसान को दुनिया में कामयाब और खुशहाल जिंदगी गुजारने के लिए जरूरी है। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया- लोगो! मेरी बात सुनो, जाहिलियत के तमाम दस्तूर मेरे पांव के नीचे हैं। तुम्हारा रब एक ही है और तुम्हारा बाप एक ही है। तुम सब के सब आदम (अलैहिस्सलाम) की औलाद हो और आदम मिट्टी से बने थे।

लिहाजा इंसान सब एक है। अरबी को अजमी पर और अजमी को अरबी पर, सुर्ख को स्याह पर और स्याह को सुर्ख पर कोई फजीलत नहीं है। अल्लाह के नजदीक तुम सब में इज्जत वाला वह है जो सबसे ज्यादा मुत्तकी और परहेजगार है। अल्लाह तआला ने तुम पर जाहिलियत की जिहालत और बाप-दादा पर फख्र को मिटा दिया है। खुदा से डरने वाला मोमिन है और खुदा का नाफरमान बदनसीब है। हर मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। इस तरह सब मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं।

गुलामों के साथ बराबरी का सुलूक करना चाहिए। जो तुम खाते हो वह उन्हें भी खिलाओ जो अपने लिए पसंद करते हो उनके लिए भी करो जो खुद पहनो वह उनको भी पहनाओ। जाहिलियत के तमाम खून बातिल कर दिए गए और सबसे पहले मैं अपने खानदान के रबी बिन हारिस के बेटे का खून बातिल करता हूं। जाहिलियत के तमाम सूद बातिल कर दिए गए और सबसे पहले मैं अपने खानदान के अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब का सूद बातिल करता हूं।

औरतों के मामले में खुदा से डरो। तुम्हारा खून और तुम्हारा माल कयामत तक उसी तरह हराम है जिस तरह से यह दिन इस महीने में और इस शहर में हराम है। मैं तुम में एक चीज छोड़ता हूं अगर तुमने उसे मजबूत पकड़े रखा तो हरगिज गुमराह न होंगे। वह है कुरआन यानी अल्लाह की किताब। फिर फरमाया कि लोगों! याद रखो मेरे बाद कोई नबी नहीं और तुम्हारे बाद कोई उम्मत नहीं। लिहाजा अपने रब की इबादत करना अरकाने इस्लाम पूरे तौर पर अदा करना। अल्लाह ने हर हकदार को इसका हक दिया है। अब किसी वारिस के लिए वसीयत जायज नहीं है। लड़का उस शख्स का है जिसके बिस्तर पर वह पैदा हुआ हो। जिनाकार के लिए पत्थर है और उसका हिसाब खुदा के जिम्मे हैं। जो शख्स अपने बाप के अलावा किसी और के नस्ब से होने का दावा करे और जो गुलाम अपने आका के अलावा किसी और की तरफ अपनी निस्बत करे उस पर खुदा की लानत है। हां औरत को अपने शौहर के माल में से इजाजत के बगैर कुछ लेना जायज नहीं, आरियत वापस की जाए, अतिया लौटाया जाए, जामिन तावान का जिम्मेदार है।

यह एहकाम बयान फरमाकर मजमे से सवाल किया कि तुम से खुदा मेरी निस्बत पूछेगा तो क्या जवाब दोगे। तमाम हाजिरीन ने जवाब दिया कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने खुदा का पैगाम पहुंचा दिया और अपना फर्ज अदा कर दिया। इस पर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने आसमान की तरफ उंगली उठाई और फरमाया- ऐ खुदा! तू गवाह रहना ऐ खुदा! तू गवाह रहना, ऐ खुदा तू गवाह रहना। ऐन उस वक्त जब आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) नबुवत का यह आखिरी फरीजा अंजाम दे रहे तो यह आयत नाजिल हुई कि आज हमने तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेमत तमाम कर दी और तुम्हारे लिए दीने इस्लाम को पसंद किया।

यानी अल्लाह ने उस खुतबे के एक-एक लफ्ज को आखिरी और अपना पसंदीदा फरमाया और अपनी मुंहर लगा दी और यह सनद दी कि अब दीन मुकम्मल हो गया। यह है वह अजीम व आलमगीर मंशूरे इंसानियत जिस पर चलकर पूरा आलमे इंसानियत हमेशा के लिए अम्न से रह सकता है।

बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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