नतीजों का असर

नतीजों का असर

दिल्ली, एन.सी.आर और निकटवर्ती हरियाणा में लोकसभा चुनाव के नतीजे एक जैसे रहे। भगवा पार्टी को सभी सीटों पर जीत मिली। इस पार्टी के लिए यह उल्लास और हर्ष का विषय है लेकिन इन नतीजों के असर से सियासत में जो घमासान दिखाई दे रहा है उसकी कल्पना भी नहीं थी।

इन नतीजों से एक निष्कर्ष तो यह निकला कि वंशवाद पर आधारित पार्टियों की चूलें हिल गईं। दिल्ली की सबसे नई पार्टी सातों सीटों पर तीसरे स्थान पर रही और उसे यह भय सताने लगा कि कहीं 2020 के विधान सभा चुनाव में उसके शासन के अंत की डुगडुगी न बजने लगे। उधर देश की सबसे पुरानी पार्टी दिल्ली में यह देखकर कुछ हद तक संतुष्ट है कि उसे सभी सीटों पर दूसरा स्थान मिला है।

इस आधार पर वह विधान सभा चुनावों के लिए मेहनत करने की अभी से तैयारी कर रही है। हार के कारण जानने के लिए एक समिति बना दी गई है। भगवा पार्टी को इन नतीजों से 22 साल का वनवास समाप्त होने की उम्मीद दिखाई दे रही है। ऐसी ही उम्मीद उसे 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद लगने लगी थी जब उसने सातों सीटों पर दिल्ली की नई पार्टी को हराकर ऐलान किया था अब विधानसभा में जीतकर भगवा पार्टी दिल्ली में सरकार बनाएगी।

2015 के विधानसभा चुनाव में नई पार्टी ने विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीतकर न केवल सरकार बनाई अपितु भगवा पार्टी की उम्मीदों पर कुठाराघात किया। अगर इन नतीजों के राष्ट्रीय स्तर पर असर की चर्चा करें तो स्पष्ट होता है कि देश की बाकी पार्टियों के भीतर कलह का माहौल बना है। सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष इस्तीफा देने को तैयार हैं जिसे स्वीकार करने के लिए कोई तैयार नहीं।

अध्यक्ष बार बार कह रहे हैं कि वह अब इस पद पर नहीं रहना चाहते। लगता है कि पार्टी ने युवा नेताओं की गुप्त बैठक में इस मसले का हल निकालने का प्रयास शुरू कर दिया है। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उŸार प्रदेश और बिहार में बने महागठबंधन की फंूक निकाल दी। उŸार प्रदेश में महागठबंधन को बहुत कम कामयाबी मिली, लेकिन बिहार में महागठबंधन का कोई प्रभाव नहीं दिखा।

महागठबंधन में शामिल पार्टियां यह अंदाज़ा भी नहीं लगा पा रही कि ऐसे परिणाम का आधार क्या रहा होगा। उŸार प्रदेश की यादव बाहुल्य पार्टी के परिवार के सदस्यों को भी मुंह की खानी पड़ी और अब इसे लेकर पार्टी के संस्थापक और वर्तमान अध्यक्ष के बीच गर्मागर्मी जारी है।

बिहार में गठबंधन की प्रमुख पार्टी द्वारा एक भी सीट नहीं जीतने के बाद जेल में बंद एम-वाई सहयोग के जनक और पूर्व मुख्यमंत्री, यादवों के मसीहा परेशान हैं और उन्हें खाना पीना अच्छा नहीं लग रहा। देश की सबसे पुरानी पार्टी में लगातार इस्तीफों का सिलसिला जारी है तो हरियाणा में ताऊ के सारे वंशज हार के बाद पूरी तरह हैरान-परेशान हैं।

– सत पाल

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