नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की जिंदगी के अहम पहलू

नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की जिंदगी के अहम पहलू
(शेख मकबूल अहमद) अल्लाह की जात बाबरकत बेशुमार सिफात से संवरी है जिनका हम शुमार नहीं कर सकते। उसने हमें अपनी चंद सिफात का इल्म दिया है जो अच्छे नामों के जरिए जाने जाते हैं। उसकी तमाम सिफात में सबसे अहम और मुकद्दस सिफत, सिफते रहमत है ज

(शेख मकबूल अहमद) अल्लाह की जात बाबरकत बेशुमार सिफात से संवरी है जिनका हम शुमार नहीं कर सकते। उसने हमें अपनी चंद सिफात का इल्म दिया है जो अच्छे नामों के जरिए जाने जाते हैं। उसकी तमाम सिफात में सबसे अहम और मुकद्दस सिफत, सिफते रहमत है जो रहमान और रहीम से जाहिर होती है। अल्लाह अपने मुताल्लिक खुद फरमाता है कि उसने अपनी सिफते रहमत को बाकी तमाम सिफात पर मुकद्दम और गालिब रखा है।

हजरत अबू हुरैरा (रजि0) से रिवायत है कि जब अल्लाह ने मखलूक को पैदा करने का फैसला किया तो अपनी किताब में लिख दिया जो अर्श पर उसके पास है यकीनन मेरी रहमत मेरे गजब से आगे बढ़ गई। एक और हदीस में हमें यह अल्फाज मिलते हैं- बिला शुब्हा मेरी रहमत मेरे गजब पर गालिब है। लिहाजा अल्लाह की रहमत पूरी कायनात पर छाई हुई है। जमीन पर पाई जाने वाली तमाम मखलूक, हैवानात, चरिंद-परिंद और पानी में पाई जाने वाली मछलियां और दीगर पानी में रहने वाली मखलूक दिन रात अल्लाह की रहमत से मुस्तफीद हो रहे हैं।

खासकर इंसान अल्लाह की नेमतो से सबसे ज्यादा फायदा उठा रहा है। वह इस तरह कि अल्लाह ने पूरी कायनात और दीगर मखलूक को इंसान के लिए मुसख्खिर कर दिया है।

अल्लाह की रहमत के दो पहलू है-एक रहमते उमूमी दूसरी रहमते खुसूसी। रहमते उमूमी के तहत तमाम जिन व इन्स और दीगर हैवानात की माद्दी जरूरतें पूरी हो रही हैं जबकि अल्लाह की खुसूसी रहमत सिर्फ इंसान के लिए है। अल्लाह की खुसूसी रहमत का जहूर इंसान की रूहानी जरूरत पूरा करने के लिए अखलाकी रहनुमाई और हिदायत की शक्ल में हुआ। आदम (अलैहिस्सलाम) को जमीन पर उतारते वक्त अल्लाह तआला ने साफ-साफ बता दिया था कि तुम्हें और तुम्हारी औलाद को एक खास मुद्दत तक जमीन पर रहना है।

फिर मेरी तरफ से कोई हिदायत तुम्हारे पास पहुंचे तो जो लोग मेरी उस हिदायत की पैरवी करेंगे वह दुनिया में अम्न व सलामती से रहेंगे और आखिरत में जन्नत में दाखिल होंगे। आदम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी औलाद को यही तालीम दी। आदम (अलैहिस्सलाम) के बाद अल्लाह की तरफ से जितने भी रसूल और अम्बिया आए सब इसी मकसद के लिए आए कि इंसानों को वह इल्म दें जिस पर अमल पैरा होकर वह दुनिया में भी अम्न व सलामती से रहे और आखिरत में भी अल्लाह की रहमत यानी जन्नत की हमेशा वाली कयामगाह के वारिस बन सकें। इस एतबार से तमाम अम्बिया और रसूल अपने-अपने दौर में अपनी बस्ती और कौम के लोगों के लिए रहमत थे।

जिस जमाने में नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पैदा हुए उस वक्त पूरी दुनिया कुफ्र व शिर्क के अंधेरों में डूबी हुई थी। दुनिया के तमाम मुल्कों में जुल्म व फसाद फैला हुआ था। हर तरफ बदअम्नी, खौफ और बेचैनी का माहौल था। अरब शिर्क जिहालत और कबाइली भेदभाव में मुब्तला थे। अपने पुरखे के तरीके को अपना दीन समझते थे और उसके मासिवा को गुमराही। कबाइली भेदभाव इतना शदीद था कि हर काबीला अपने को आला और दूसरे कबीले को अपने से कमतर समझता था। कबाइल में छोटी-छोटी बातों पर जंग छिड़ जाती और यह जंग नस्ल दर नस्ल चलती रहती। सफेद रंग वाले स्याह रंग वाले को गुलाम बना लेते।

औरत की कोई इज्जत नहीं थी। लड़की का पैदा होना जिल्लत का बाइस समझा जाता और लड़की पैदा होते ही जिंदा दफन कर दी जाती। औरत के लिए कोई हक नहीं था। दुनिया के दूसरे मुल्कों और तहजीबों का हाल इससे ज्यादा खराब था। यहूदी अपने आप को तमाम कौमों से आला और दीगर कौमों को अदना व कमतर समझते थे। उनका कानून अपने लिए अलग था और दूसरों के लिए अलग। तलमूद के मुताबिक जब एक यहूदी और गैर यहूदी का मुकदमा अदालत में आता तो उनके जज को यह हुक्म था कि फैसला यहूदी के हक में दिया जाए चाहे वह हक पर हो या न हो। यही हाल ईसायों का था। वह सिर्फ अपने आप को हिदायतयाफ्ता और दूसरों को गुमराह समझते थे।

शराब, जिना और रिश्वत को उन्होंने अपने लिए हलाल कर लिया था। औरत को गुनाहों की पुतली और पाप की देवी समझते थे। औरत का कोई मकाम व मरतबा न था न ही उसका कोई हक। उन्होंने रहबानियत ईजाद कर ली थी और रहबानियत की आड़ में ईसाई पादरी गिरजा में जिनाकारी किया करते थे। उनमें भी रंग व नस्ल की बुनियाद पर भेदभाव पाया जाता था। गोरे लोग कालों को अपने से कमतर और अपना गुलाम समझते थे।

यही हाल यूनान, मिस्र, रोम और हिन्दुस्तान का था। यहां भी रंग, नस्ल और जात-पात की बुनियाद पर इंसानों के बीच तकसीम पाई जाती थी। यूनानी गैर यूनानी को अपना गुलाम बना लते और उसके साथ जानवरों जैसा सुलूक करते। यहां तक कि अपनी तफरीह के लिए एम्फी थिएटर में बैठकर जिंदा गुलाम को भूके शेर के सामने छोड़ देते और उसे एक तमाशा बनाकर लुत्फ अंदोज होते। औरत को हकीर और मर्द की जिन्सी ख्वाहिशात पूरा करने की चीज समझा जाता। मिस्र और रोम में भी गुलामी का रिवाज पाया जाता था और औरत को महज जिन्सी तस्कीम का सामान। तकरीबन यही हाल हिन्दुस्तान का था। यहां भी नस्ली बरतरी का तसव्वुर कारफरमा था। ब्राहमण को दूसरी जातों पर मजहबी और सियासी बरतरी हासिल थी।

ब्राहमण तबका महजब की आड़ में निचली जात वालों पर हर तरह के जुल्म व ज्यादती को अपना पैदाइशी हक समझता था। उनको मंदिरों में आने की इजाजत नहीं थी। उनकी औरतों को ब्राहमण जब चाहे अपनी हवस का शिकार बनाते। इसके लिए उन्होंने मजहब की आड़ में ‘‘देवदासी’’ का तरीका रायज कर लिया था और मंदिरों में देवदासियों से शहवतरानी को मजहबी तकद्दुस का दर्जा हासिल था। इस तरह पूरी दुनिया में जिहालत, हैवानियत, जब्र, जुल्म व सितम और भेदवभाव का फसाद फैल चुका था। यह वह हालात थे जिनमें अल्लाह तआला ने एक इंसान पर दूसरे इंसान की हुकूमत के खात्मे, तमाम इंसानों को बिला तफरीक मर्द व औरत यकसां हुकूक देने, जमीन पर अम्न व सलामती, अदल व इंसाफ के कयाम और इंसानों को जुल्म व फसाद से हमेशा के लिए निजात पाने के लिए नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को रसूले रहमत बनाकर मबऊस फरमाया। ‘‘ऐ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! हमने तो आप को तमाम आलम के लिए रहमत बनाकर भेजा है।’’ (सूरा अम्बिया -107) हजरत इब्ने उमर (रजि0) से रिवायत है कि नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया-‘‘मैं अल्लाह की भेजी हुई रहमत हूं ताकि (अल्लाह का हुक्म मानने वाली) एक कौम को सरबुलंद करूं और दूसरी कौम (हुक्म न मानने वाली) को पस्त करूं।’’

अल्लाह तआला ने कयामत तक पैदा होने वाले तमाम इंसानों की हिदायत और रहनुमाई के लिए रसूले रहमत (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के साथ अपनी किताबे रहमत कुरआने मजीद भी नाजिल फरमाई। ‘‘लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से नसीहत आ गई है यह वह चीज है जो दिलों के मरज के लिए शिफा है और जो उसे कुबूल कर ले उनके लिए रहनुमाई और रहमत है।’’ (सूरा यूनुस -57.58) इस तरह आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जाते मुबारक तमाम आलम के लिए रहमत का बाइस बनी। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कुरकाने मजीद और अपनी अमली रहनुमाई से बनी आदम को वह इल्म अता किया जो इंसानी जिंदगी के हर शोबे, हर मामले, हर मरहले में सही और वाजेह रहनुमाई करता है। जो हक व बातिल, हलाल व हराम, जायज व नाजायज क्या है, इंसानों को बताता है कि उनके लिए अम्न व सलामती की राह कौन सी है और तबाही व बर्बादी की कौन सी?

नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जब अपनी दावते रहमत का आगाज किया तो मक्का के सरदार आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की बअसत को अपने लिए मुसीबत और जहमत समझने लगे। इसके जवाब में उन्हें बताया गया कि जिसे तुम अपने लिए जहमत समझ रहे हो दरअस्ल वह अल्लाह की जानिब से तुम्हारे लिए सबसे बड़ी रहमत बनकर आया है। रसूले रहमत हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की दस साला दावते और जद्दोजेहद से मक्का में सहाबा-ए-कराम की एक अजीम और ताकतवर जमाअत तैयार हुई और मदीना हिजरत के बाद तेरह साला जद्दोजेहद के नतीजे में दुनिया में वह अजीम तरीन इंकलाब बरपा हो गया जिसने तारीख के रूख को हमेशा के लिए मोड़ कर रख दिया।

अल्लाह की रहमत का यह पैगाम खिलाफते राशिदा के दौर में अरब से निकलकर सारे आलम में फैल गया। जुल्म व ज्यादती के बोझ से कराहती हुई इंसानियत को अम्न व सलामती का यह पैगाम अपने जमीर की आवाज लगने लगा, दिलों की दुनिया मुसख्वर होती चली गई। लोग जौक दर जौक दीने इस्लाम में दाखिल होने लगे, कौम पर कौम और मुल्क पर मुल्क फतेह होते चले गए।

वहदते बनी आदम का यह उसूल रहती दुनिया तक इंसानों के लिए अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जानिब से सबसे बड़ी रहमत है। जब यह उसूल दुनिया में फैला और लोग जब तक इस उसूल पर कायम रहे तारीख गवाह है कि वह तारीखे इंसानी का सबसे सुनहरा दौर था। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह बशारत सुनाई थी ‘‘बहुत जल्द वह दौर आने वाला है जब एक औरत तनहा अरब के एक किनारे से दूसरे किनारे तक सोना उछालती हुई चली जाएगी और उसके दिल में खुदा के सिवा किसी का खौफ नहीं होगा।’’ यह मंजर भी दुनिया अपनी आंखों से देख चुकी है, न तो उसे सोने की चोरी का खौफ था न ही अपनी इज्जत के लुटने का। बिलादे इस्लामिया में हर तरफ चैन व सुकून, अम्न सलामती थी, इंसान के बुनियादी हुकूक की जमानत हासिल थी और मुसलमान पूरी दुनिया पर गालिब थे। लेकिन जैसे-जैसे मुसलमान इन उसूलों से हटते चले गए और कबीलों और फिरकों में बटने लगे तो मगलूब होते चले गए।

स्पेन में आठ सौ साल हुकूमत करने के बाद जब वहां मुसलमान तफरके का शिकार हुए तो न सिर्फ मुल्क उनके हाथों से गया बल्कि मुसलमानों का नाम व निशान वहां से मिटा दिया गया। इसकी वजह यह थी कि मुसलमान वहां कबीलों की बुनियाद पर आपस में लड़ने लगे और उनकी ताकत टूट गई। इसी तरह हिन्दुस्तान में बारह सौ साल हुकूमत करने के बाद जब यहां मुसलमान तफरके का शिकार हुए और सैयद, शेख, मुगल, पठान जैसी जात बिरादरी और पंजाबी, सिंधी, दक्कनी और शुमाली जैसे सूबाई और इलाकाई भेदभाव का शिकार हुए तो पहले सिखों और मरहटों से पिटे और आखिरकार अंगे्रजों के गुलाम बन कर रह गए।

इसी तरह बिलादे इस्लामिया में मुसलमान अखलाकी और सियासी लिहाज से कमजोर होते चले गए। यहूदियों और ईसाइयों की साजिश से तुर्की में खिलाफत का खात्मा हो गया और मिल्लत इस्लामिया बिखर कर रह गई। अरबों ने इस्लाम के बजाए कौम और वतन को, अपना आइडिया बना लिया।

मुस्लिम ममलिकत तुर्क, ईरान, इराक, अरब, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन और कुवैत जैसी छोटी इकाइयों में बंट कर रह गई। खिलाफत को खत्म करने और मिल्लते इस्लामिया का ढांचा बिखेरने की साजिश में कामयाब होेने के बाद यहूद व नसारा ने मुसलमानों और मुस्लिम मुल्कों के खजानों और कुदरती जखीरों को खूब लूटा और यह लूट आज तक जारी है। मुस्लिम मुल्कों के सियासी लीडर अपने जाती मफादात पूरा करने के लिए यहूद व नसारा की कठपुतलियां बने हुए हैं। जहां कहीं मुसलमान बेदार हो रहे हैं और इस्लामी फिक्र और उसूलों की तरफ लौटने की जद्दोजेहद कर रहे हैं वहां पच्छिमी इस्तेमार सीधे मुख्तलिफ सियासी हथकण्डे इस्तेमाल करके उनपर हमले कर रहे हैं। फिर इन्हीं मुल्कों के मुसलमानों में से अपने पिट्ठू पैदा करके फिक्रे इस्लामी और इस्लाम के गलबे के लिए जद्दोजेहद कर रही तंजीमों और तहरीकों को दबाने और कुचलने और खत्म करने की कोशिश कर रहा है।

————बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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