1857 के विद्रोह में मुसलमानों को संगठित करने वाले पीर अली के वंशज चितरपुर में!

1857 के विद्रोह में मुसलमानों को संगठित करने वाले पीर अली के वंशज चितरपुर में!
रांची : बिहार के एक प्रमुख मुस्लिम क्रांतिकारी पीर अली के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। एक गरीब बुक बाइंडर पीर अली खान, जो स्वतंत्रता सेनानियों के बीच मत्वपूर्ण पत्रिकाएं, पुस्तिकाएं और खुफिया संदेशों को गुप्त रूप से वितरित करते थे, उन्हें तत्कालीन पटना के कमिशनर विलियम टेलर द्वारा सार्वजनिक स्थान पर फांसी दी गई थी। पीर अली एक स्वतंत्रता सेनाथी थे जिन्होंने अंग्रेजों से लड़े और उन्हें फांसी दे दी गई। पीर अली बाबू वीर कुंवर सिंह की तरह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बिहार चैप्टर के नायक थे और आजादी के जंग में उनका योगदान कुंवर सिंह से कम महत्वपूर्ण नहीं था. पीर अली खान और उनके साथियो ने 1857 में ‘वहाबी’आन्दोलन का नेतृत्व किया था, क्योकि वो खुद इससे जुड़े थे. लेकिन इतिहास पुस्तकों में उनका कोई उल्लेख नहीं है। असंगत स्वतंत्रता सेनानियों को कोई मान्यता नहीं मिली, हालांकि उन्होंने अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए अपनी जान का बलिदान दे दिया।
झारखंड के रामगढ़ जिला के चीतरपुर गांव के रहने वाले मो तसनीम जो पीर अली खान के वंशज बताते हैं, उन्होंने इसका सुबुत भी दिया जो 1909 के खातियान में उनके परदादा पीर अली खान का नाम दर्ज है. हालांकि यह खोज अभी शुरूवाती चरण में है वो इस खोज के लिए सासाराम भी गए थे जहां उनके रिश्तेदार भी रहे हैं पर अब वो वहां नहीं हैं और कहीं और बस गए हैं. उनके मुताबिक पीर अली खान साहब का वहां लिंक भी रहा है.
मो तसनीम के वालिद मर्हुम निजामुद्दीन जो द्वतिय विश्व युद्ध के आर्मी थे. रिटायर्ड के बाद उनका पोस्टिंग जमशेदपुर रेलवे डिपार्टमेंट में हुआ जो लगभग 102 वर्ष तक जिंदा रहे और फिर उनकी वफात के बाद रामगढ़ जिला के चितरपुर में दफ्न किया गया.
गौरतलब है कि पीर अली बाबू वीर कुंवर सिंह की तरह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बिहार चैप्टर के नायक थे और आजादी के जंग में उनका योगदान कुंवर सिंह से कम महत्वपूर्ण नहीं था. पीर अली खान और उनके साथियो ने 1857 में ‘वहाबी’आन्दोलन का नेतृत्व किया था, क्योकि वो खुद इससे जुड़े थे,  इनकी नुमाइंदगी “उलमाए सादिक़पुरीया” करते थे. अब बहुत से लोग जानते हैं कि पीर अली खान कौन था। यह शहीद अब पटना डीएम के निवास के विपरीत बच्चों के पार्क को विकसित करने के लिए राज्य सरकार के फैसले के लिए बहुत कम ज्ञात है और खान के नाम पर इसे नामित किया गया था, जिसे 7 जुलाई, 1857 को पीर अली खान समेत 30 विद्रोहियों को पटना आयुक्त विलियम टेयलर की उपस्थिति में मौत की सजा सुनाई गई थी। पीर अली उस वक्त 37 साल के थे.
पटना में पीर अली का मजार भी है और उनके नाम का एक मोहल्ला पीरबहोर भी है. आजमगढ‍़ के गांव मुहम्मदपुर में जन्मे पीर अली पारिवारिक वजहों से अपनी किशोरावस्था में ही घर से भागकर पटना आ गए थे. पटना के एक जमींदार नवाब मीर अब्दुल्लाह ने उनकी परवरिश की और उन्हें पढ़ाया-लिखाया. दिल्ली के क्रांतिकारी अजिमुल्लाह खान से वे मार्गदर्शन प्राप्त करते थे. 1857 की क्रांति के वक्त बिहार में घू-घूमकर लोगों में आजादी और संघर्ष का जज्बा पैदा करने और उन्हें संगठित करने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी.
गरचे वे साधरण पुस्तक विक्रेता थे, फिरभी उन्हें पटना के कद्दावर लोगो का समर्थन प्राप्त था। क्रांतिकारी परिषद्, पर उनका अत्यधिक प्रभाव था। उन्होंने धनी वर्ग के सहयोग से अनेक व्यक्तियों को संगठित किया और उनमें क्रांति की भावना का प्रसार किया। लोगों ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि वे ब्रिटिशी सत्ता को जड़मूल से नष्ट कर देंगे। जब तक हमारे बदन में खून का एक भी रहेगा , हम फिरंगियों का विरोध करेंगे, लोगों ने कसमे खाईं।
पीर अली की पैदाइश स्थान ग्राम मुहम्मदपरर, आज़मगढ़, यूपी है जहां के वे मुल निवासी थे. पीर अली खान का परिवार मूल रूप से खंडवाड़ी (भारत के उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के सकलडीहा तहसील में स्थित है।) से संबंधित था. जहां उनके पिता मेहर अली खान अपने दादा के साथ बसने के लिए मुहम्मद पूर में चले गए थे।
गदर के सहयोगी
पीर अली : 1857 आंदोलन के संगठक थे. पटना में अंगरेजी राज के विरोध में पहली बार निकलनेवाले जुलूस का नेतृत्व किया था.
राजा मेंहदी अली खां : नवादा के अंतीपुर के रहनेवाले राजा मेंहदी अली खां का नाम विद्रोहियों के नाम की सूची में पहले स्थान पर था.
वारिस अली : पटना के मुसलमानों के साथ राजद्रोहात्मक पत्र व्यवहार के कारण अंग्रेजों ने इन्हें 23 जून,1857 को गिरफ्तार किया. बाद में फांसी दे दी.
लुत्फ अली खां : 1857 विद्रोह के दौरान इन पर अपने मकान में गुप्त बैठक करने का आरोप कमिश्नर विलयम टेलर ने लगाया. लुत्फ अली पटना के मशहूर बैंकर थे.
अली करीम : वारिस अली की गिरफ्तारी के बाद इन पर सरकार के खिलाफ बगावत का आरोप लगा. अंग्रेजी सरकार ने इन पर दो हजार रुपये इनाम रखा था.
जवाहिर रजवार : नालंदा व नवादा में 1857 में छापामार युद्ध इन्होंने शुरू की थी. देवघर के विद्रोहियों का जत्था नवादा होकर गुजरा, तो बगावत का झंडा बुलंद किया.
हैदर अली : विद्रोह के दौरान हैदर अली ने राजगीर को कब्जे में ले लिया था. वे नालंदा के पहले व्यक्ति थे , जिन्हें फांसी की सजा दी गयी थी.
नादिर अली : जयमंगल व माधव सिंह के साथ अंग्रेजों के छक्के छुड़ाये. बिहारशरीफ के चरकोसा गांव के नादिर की चतरा, हजारीबाग, डोरंडा, रांची में विद्रोह में मुख्य भूमिका थी.
कुरबान अली : रांची समाहरणालय में कुरबान नाजीर के रूप में कार्यरत थे. 1857 के विद्रोह के बाद सरकारी संपत्ति की लूट व अन्य आरोप में काला पानी की सजा हुई.
सलामत-अमानत : देवघर के रोहिनी में 12 जून, 1857  के विरोध के महानायक सलामत अली -अमानत अली थे. मेजर मैकडोनाल्ड व कई अधिकारियों पर हमला किया था.
sources of about Peer Ali Khan : Our Crisis (by W. Taylor), Unsung Martyrs of 1857(A. K. Biswas, abridged by I.K.Shukla),   A History of Indian Mutiny( G.W.Forrest), Account of Major Thomas Rettary,Karwan-i-Raftah(Naqui Ahmad Irshad ),Peer Ali –Navel( Shad Azeemabadi,compiled by Naqui Ahmad  Irshad )& Mshahir-i- Jang-i- Azadi( Intizamullah Shihabi).
(Vol. 4 No. 1 - 2011) - Prof. Zafarul Islam Department of Islamic Studies, Aligarh Muslim University, Aligarh
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