हैदराबाद 8 फ़रवरी उसे उस की माँ बड़ी मुश्किल से सँभाल रही थी चूँकि वो ज़हनी और जिस्मानी तौर पर माज़ूर है। इस लिए ऑटो से उतारने में माँ को शदीद मुश्किल पेश आ रही थी। पहले तो वो ख़ुद कमज़ोर दिखाई दे रही थी इसे में एक 20 साला माज़ूर बेटे का बोझ उठाना बहुत मुश्किल लग रहा था फिर भी वो ख़ातून अपने अपाहिज बेटे को ऑटो से उतारने में कामयाब रही लेकिन उस की सांस फूल रही थीं।
कुछ देर वो इसी तरह ख़ामोश खड़ी रही और माज़ूरीन के लिए दिए जाने वाले माहाना वज़ीफ़ा की रक़म हासिल करने के बाद चैन की सांस ली। क़ारईन ! हम काले पत्थर बशारत नगर की रहने वाली ग़रीब और शरीफ़ ख़ातून अनीस बेगम की बात कर रहे हैं।
चार बेटों और 5 बेटीयों की माँ अनीस बेगम के लिए इस तरह की मुसीबत और परेशानी कोई नई बात नहीं। उन्हें हर माह इसी तरह की सख़्त जद्दो जहद का सामना करना पड़ता है। जब वो अपने दो माज़ूर बच्चों को लिए चन्दू लाल बारादरी में वज़ीफ़ा माज़ूरीन हासिल करने पहूँचती हैं।
अनीस बेगम की जद्दो जहद को देख कर राक़िमुल हुरूफ़ ने सवाल किया कि अम्मां आप इस तरह परेशानी का सामना करते हुए यहां क्यों आती हैं? तब उन्हों ने बताया कि दरअसल वो अपने माज़ूर बच्चों के लिए वज़ीफ़ा माज़ूरीन हासिल करने हर माँह यहां आती हैं और दो बच्चों के लिए उन्हें 1000 रुपये हासिल होते हैं।
अफ़सोस के साथ इस ख़ातून ने ये भी बताया कि ऑटो में आने जाने के लिए दो सौ रुपये ख़र्च हो जाते हैं और माज़ूर बच्चों के लिए सिर्फ़ 800 रुपये बाक़ी रहते हैं इस महंगाई के दौर में दो बच्चों के लिए 800 रुपये ख़र्च ऐसा तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता। अनीस बेगम के शौहर मुहम्मद उमर कपड़े की दुकान में मुलाज़िम हैं और यौमिया 200 रुपये कमा लेते हैं।
इस तरह छः साढे़ छः हज़ार में 9 बच्चों के खाने पीने का इंतिज़ाम करना पड़ता है जबकि घर का किराया ही 3000 रुपये है। उन के इन अलफ़ाज़ को सुन कर आस पास ठहरे हुए लोगों ने पुरज़ोर अंदाज़ में कहा कि बर्क़ी बिलों के लिए हर मुहल्ला में कई कई मराकज़ क़ायम किए जाते हैं यहां तक कि बिल्स की वसूली के लिए घर घर पहूंच कर दस्तक देने से भी ओहदेदार नहीं शरमाते।
इस तरह नल का बिल भी ज़ोर ज़बरदस्ती से वसूल किया जाता है, लेकिन जब वज़ीफ़ा पीरानासाली, वज़ीफ़ा माज़ूरीन की बात आती है तो हुकूमत का रवैया मुख़्तलिफ़ होता है।
मजबूर ज़ईफ़ मर्द और ख़वातीन और माज़ूरीन को बड़ी मुश्किल से दूरदराज़ मुक़ामात पर क़ायम करदा सेंटर्स से रुजू होना पड़ता। काश! हुकूमत को इन माज़ूरीन और उन के सरपरस्तों की तकालीफ़ और मुश्किलात का अंदाज़ा होता।