अच्छे अखलाक की अहमियत

नबी करीम (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) ने फरमाया-‘‘ तुम में सबसे बेहतर वह है जो तुम में अखलाक में सबसे अच्छा है।’’ (सही मुस्लिम) हुस्ने अखलाक का मतलब है एक इंसान का जिन-जिन से भी वास्ता पड़ता है उन सबसे अच्छा बरताव करे।

उनके हुकूक सही तरीके से अदा करे। उनकी बाबत जो जिम्मेदारियां उस पर आइद होती है उन्हें बहुस्न व खूबी पूरा करे। न जुल्म व ज्यादती करें न कोई कोताही बरते। इसी हुस्ने अखलाक पर मआशरे (समाज) के अमन व सुकून का इंहिसार है।

अगर लोग हुस्ने अखलाक से आरास्ता होंगे तो इसका मतलब यह होगा कि उस समाज में लोग एक दूसरे के हुकूक व फरायज अदा कर रहे है कोई किसी के साथ ज्यादती कर रहा है न किसी कोताही का कसूरवार हो रहा है। जाहिर बात है कि जिस समाज में ऐसा होगा वह एक मिसाली मआशरा होगा, जुल्म व ज्यादती से पाक, बुग्ज से पाक, द्दोका-फरेब और जालसाजी से पाक। सभी बसने वाले इंसान एक दूसरे के हमदर्द, गम ख्वार, रफीक और एक दूसरे के मआविन व दस्त व बाजू होंगे। वहां अम्न व सुकून का डेरा होगा और लोग खुशगवारी की बहार से सरशार होंगे।

इस्लाम ऐसा ही समाज कायम करना चाहता है जिसका एक नमूना इस्लामी तालीमात के पैकरो ने अहदे रिसालत व सहाबा में दुनिया के सामने पेश किया और चश्म फलक ने उसका नजारा किया और अहले तारीख ने उसको अपनी किताबों में कलमबंद और महफूज किया। इस हदीस में इसी अखलाक व किरदार की बुलंदी की तरगीब दी गई है जिसे अख्तियार करके सहाबा (रजि0) दुनिया और अहले दुनिया के लिए एक बेहतरीन नमूना और काबिले अमल करार पाए। आज भी समाज में वही लोग बेहतर समझे जाते हैं जो अखलाक व किरदार के हुस्न से आशना और इसकी बुलंदियों से हम किनार हैं और उन्हीं के दम कदम से फिजा में कहीं कहीं खुशगवार हवा के झोंके महसूस होते हैं।

बशुक्रिया: जदीद मरकज़