तरक़्क़ी-ओ-ख़ुशहाली कामयाबी और दुनिया में इज़्ज़त-ओ-एहतिराम के लिये तालीम बहुत ज़रूरी है । तालीम के बगैर इंसान ना मुकम्मल होता है और ज़िंदगी सोच-ओ-फ़िक्र तद्-ओ-तफ़क्कुर और पाकीज़ा ख़्यालात से दूर होजाती है । तालीम ही सब कुछ है । और माज़ूरी तालीम या तरक़्क़ी में हरगिज़ रुकावट नहीं बनती ।
सिर्फ़ अल्लाह की मदद चाहीए और इस ने हर मुआमला में मेरी भरपूर मदद की है । अल्लाह ताली का शुक्र एहसान है कि इस ने मुझे पैरों से माज़ूर रखा , ज़हन से नहीं । वर्ना मैं तालीम जैसी नेअमत से महरूम रहता ।
ये ख़्यालात 33 साला ग़ुलाम दस्तगीर के हैं जो पोलियो के बाइस दोनों पैरों से माज़ूर हैं लेकिन हुसूल-ए-इल्म की जुस्तजू और बुलंद हौसलों ने उन्हें कामयाबी की जानिब गामज़न किया है ।
ग़ुलाम दस्तगीर से हमारी मुलाक़ात दफ़्तर वक़्फ़ बोर्ड के अहाता में हुई वो वहां अपने बच्चों के लिये मेनारेटी स्कालर शिपस के लिये आए हुए थे । हम ने उन की हरकियाती शख्सियत को देखते हुए सोंचा कि क्यों ना क़ारईन को आज ग़ुलाम दस्तगीर से वाक़िफ़ करवाएं ।
ग़ुलाम दस्तगीर गर्वनमैंट स्कूल में टीचर हैं और तीन बच्चों के बाप , अगरचे उन की पैदाइश और सारा ख़ानदान शमस आबाद में वाक़ै आबाई मकान में मुक़ीम है लेकिन फ़िलवक़्त वो हैदराबाद से 80 केलो मीटर दूर ज़िला परिषद हाई स्कूल मोमिन पेट के करीब मुक़ीम हैं वो इस स्कूल में स्कूल अस्सिटैंट की हैसियत से काम करते हैं ।
ग़ुलाम दस्तगीर ने उर्दू से एम ए , बी एड किया है । 8 साल से वो सरकारी मदारिस में ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं । उन्हों ने ये भी बताया कि मोमिन पेट ज़िला परिषद हाई स्कूल पर तबादला से क़बल वो शमस आबाद और कुंदू पर के स्कूलों में भी ख़िदमात अंजाम दे चुके हैं और अब उन की तनख़्वाह 22 हज़ार रुपये है ।
अपनी माज़ूरी के बारे में तफ़सीलात बताते हुए ग़ुलाम दस्तगीर कहते हैं कि 6 माह की उम्र में वो पोलियो का शिकार होगए । जिस के नतीजा में दोनों पैर भी नाकारा होगए ।
तलबा-ए-को अंग्रेज़ी , समाजी इलम और उर्दू के मज़ामीन पढ़ाने वाले ग़ुलाम दस्तगीर का ये भी कहना है कि इन की ज़िंदगी को बनाने सजाने और संवारने में उन के दोस्तों का अहम रोल रहा है ।
बहरहाल ग़ुलाम दस्तगीर ख़ुशगवार अज़दवाजी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं उन्हें 2 लड़के और एक लड़की है । ग़ुलाम दस्तगीर उन हटे कटे नौजवानों के लिये एक सबक़ और एक पयाम है कि तालीम के बगैर पैर रखते हुए भी तरक़्क़ी ख़ुशहाली कामयाबी-ओ-कामरानी और नेकी की जानिब क़दम आगे नहीं बढ़ सकते ।
तालीम समाज में किसी फ़र्द को भी मुमताज़ मुक़ाम दिलाती है । क़ौम-ओ-मिल्लत में इस की अहमियत बतलाती है और तालीम ही वो हथियार है जिस के ज़रीया जहालत तास्सुब , असबीयत , जानिबदारी और ना इंसाफ़ी जैसी बुराईयों का सफ़ाया किया जा सकता है ।।