रॉ के पूर्व प्रमुख ए एस दौलत ने शनिवार को यहां कहा कि 1999 में करगिल संघर्ष से पहले करगिल की चोटियों पर घुसपैठ की खुफिया रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी गई थी। दौलत संघर्ष के वक्त खुफिया ब्यूरो में थे। उन्होंने कहा कि अहम जानकारियां तत्कालीन गृह मंत्री एल के आडवाणी के साथ साझा की गई थीं, उस वक्त वह देश के उप प्रधानमंत्री थे। चंडीगढ़ में आयोजित मिलिट्री लिट्रेचर फेस्टिवल में ‘विस्डम ऑफ स्पाइज’ विषय पर चर्चा के दौरान दौलत ने कहा कि जंग से पहले सेना द्वारा इकट्ठा की गई जानकारी के साथ खुफिया रिपोर्ट को केंद्र के साथ साझा किया गया था।
इससे पहले, ले. जनरल (सेवानिवृत्त) कमल डावर ने तीनों रक्षा इकाइयों को एकीकृत कमान में रखने की अहमियत को रेखांकित किया। खुफिया मामलों में एनएसए के दखल को लेकर आगाह करते हुए डावर ने कहा कि सूचनाएं होना एक चीज है और सभी उपलब्ध जानकारियों पर कार्रवाई करना दूसरी चीज है। उन्होंने मेंडेरिन, सिंहली और पश्तों जैसी भाषाओं पर अधिकार प्राप्त करने की जरूरत पर जोर दिया। इच्छित परिणाम के लिए बुद्धि और तकनीक का मिलकर काम करना जरूरी है, यह समझाते हुए ले. जनरल डावर ने कहा, ”इन दो पहलुओं के मिलन पर ही हमारी खुफिया क्षमता निर्भर करेगी।”
ले. जनरल (सेवानिवृत्त) संजीव के लोंगर ने उन्होंने मिलिट्री इंटेलिजेंस की कमी पर बात करते हुए कहा कि अब भी जरूरत की सिर्फ 30 से 40 फीसदी इंटेलिजेंस होने पर भी ऑपरेशन लॉन्च कर दिए जाते हैं। सामूहिक एकीकृत कमान के मुद्दे पर अलग विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में हमें विभिन्न प्रमुखों की जरूरत हैं जो साथ आकर एक अहम फैसले में योगदान दें।
दुलत और ले. जनरल डावर ने यह भी कहा कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के बारे में कोई राय बनाने से पहले उन्हें थोड़ा वक्त दिया जाना चाहिए। दुलत ने याद दिलाया कि खान ने हाल ही में मुंबई हमलों को आतंकी घटना बताया था।