अब्बू एमल- हमारे बेशुमार साहब-ए-कमाल बुज़ुर्गों में मियां मुशक भी शामिल हैं जो क़ुतुब शाही दौर में गुज़रे हैं। ये इस ज़माना में सलातीन क़ुतुब शाही के मोतमिद सरलशकरा हुआ करते थे। ये ओहदा आजकल कमांडर कहलाता है। मियां मुशक किलीद बर्दार भी थे जो ऐसी अहम ख़िदमत थे कि हुकूमत वक़्त की सारी चाबियां, कुंजियां और अहम महर उन की तहवील में हुआ करति थि। इस लिहाज़ से इस ख़िदमत पर किसी इंतिहाई ईमानदार, वफ़ादार, जानिसारशख़्स ही को मामूर किया जाता था। साहिब मा असर ना दक्कन का ख़्याल है के ये नाम के लिहाज़ से तो कोई आ फ्रीकी मालूम होते हैं। मियां मुशक ने मस्जिद तामीर की थी जो पुराना पुल के क़रीब आज भी अल्हम्दुलिल्ला क़ायम है।
ये तारीख़ी मस्जिद 5 एकड़ 3 गनटे अराज़ी पर है। वक़्फ़ बोर्ड रिकार्ड के मुताबिक़ 3-4-1941 तारीख़ के नक़्शा में इस मस्जिद का ज़िक्र मौजूद है। मियां मुशक एक नेक इंसान थे। उन्हों ने 1092हमें वफ़ातपाई। इसी मस्जिद से मुत्तसिल आप का मक़बरा भी है, जिस की तामीर 1674-ए-में हुई थी। मक़बरा और मस्जिद पर कुतबा भी है जो संग स्याह का बना है। आज तक भी मौजूद है। दोनों चीज़ें मज़बूत और अच्छी हालत में हैं। मियां मुशक एक ख़ुशज़ौक़ इंसान थे।चुनांचे उन्हों ने अतापोर में एक आलीशान महल भी बनाया था जो आज भी मौजूद है लेकिन एक ग़ैरमुस्लिम लैंड गर अब इस पर क़ाबिज़ है। मस्जिद मियां मुशक के फ़नतामीर उस की सफ़ा-ओ-रौनक को ज़बत तहरीर में लाना बेहद मुश्किल काम है।
इसी लिए क़ारईन एक बार मस्जिद मियां मुशक और मक़बरा और दार-उल-अक़ामा का अपनी नज़रों से मुशाहिदा करलीं। ख़ास बात ये है केये मस्जिद मियां मुशक वक़्फ़ बोर्ड के तेहत है। मस्जिद के तेहत मलगयात भी हैं, जिस में ज़्यादा तर किरायादार ग़ैरमुस्लिम हैं, लेकिन मिलगियों का माहाना किराया सुन कर आप को सदमा भी होगा और सख़्त ताज्जुब भी होगा किराया इतना कम है केइतनी रक़म में तो एक लीटर पैट्रोल भी नहीं मिलता है। इस महंगाई के दौर में इतना कम किराया दिया जा रहा है। इस अल्लाह के घर के किराया दारों के नख़रे भी निराले हैं। कुछ ऐसे भी किरायादार हैं जो मस्जिद की मिल्कियत का बराएनाम किराया देते हैं लेकिन इस जगह को दूसरों को मुंहमांगे किराया पर Sub-Tenent या ज़ेली किरायादार बना कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं। इन हक़ायक़ की वक़्फ़ बोर्ड को तहक़ीक़ करनी चाहीए ताकि मस्जिद की आमदनी में इज़ाफ़ा किया जा सकी। ये बात तो बतौर यूं हीतज़किरा में आ गई असल में हम मस्जिद मियां मुशक में वाक़्य दार-उल-अक़ामा का ज़िक्र कररहे थे, जो आज भी मस्जिद में मौजूद है।
1358 हिज्री में सर अकबर नवाब हैदरनवाज़ जंग बहादुर सदर आज़म बाब हुकूमत ने इस इक़ामत ख़ाना का इफ़्तिताह किया था। हमारे बुज़ुर्ग हर काम रज़ाए रब के लिए इंतिहाई इख़लास नीयत से किया करते थे। तब ही तो उन की निशानीयां आज तक बरक़रार हैं। दार-उल-अक़ामा की तख़्ती आज भी मौजूद है, जिस पर ये इबारत कुंदा है केइस इक़ामत ख़ाना में मुरत्तेबा क़वाइद के तेहत अज़ला के ग़ैर मुस्तती जो साहिब इस्तिताअत ना हूँ को रखा जाएगा और उन की दीनी तर्बीयत की जाएगी। इन पर लाज़िम रहेगा वो शआर इस्लामी के पाबंद रहे। दूसरी तालीम के लिए वोदीगर इदारों में जा सकें गी। अली उद्दीन अहमद नाज़िम उमूर मज़हबी अह्द उसमानी 13589 हिज्री ।
इस तारीख़ी इक़ामत ख़ाना का जब मुआइना किया तो देखा कि इस का फ़र्शजगह जगह से टूट फूट चुका है। वो कमरे जो मुकम्मल तौर पर पत्थर से बने थे उन की बेहतर देख भाली ना होने की वजह से ख़सताहाल होगए हैं। कमरों की तादाद 35 है जो आजकल किसी बड़े से बड़े हॉस्टल में भी नहीं होती। 60 तलबा इक़ामत पज़ीर हैं। किसी कमरा में एक तालिब-ए-इलम है तो किसी में दोता पाँच मुक़ीम हैं। इन का ताल्लुक़ अज़ला से है, जिन में मीदक, महबूबनगर, आदिल आबाद, निज़ाम आबाद के तलबा शामिल हैं, जोमुख़्तलिफ़ कॉलिजों में तालीम हासिल कररहे हैं। इन तलबा से भी हम ने बातचीत की। उन्हों ने बताया कि पहले इन का क़ियाम बिलकुल्लिया तौर पर मुफ़्त हुआ करता था, लेकिन आजकल देख भाल के नाम पर एक तालिब-ए-इल्म से 100 रुपय लिए जा रहे हैं मस्जिद मियां मुशक, दार-उल-अक़ामा और 5 एकड़ 3 गनटे ज़मीन की हिफ़ाज़त हमारीदीनी और क़ानूनी ज़िम्मेदारी है।
हम ख़ुद मिल्लत-ए-इस्लामीया को कुछ नहीं दे सकते लेकिन उन की जो अल्लाह का ख़ौफ़ दिलों में रखते थे बनाई हुई इमारतों, वक़्फ़ करदा जायदादों का कम अज़ कम तहफ़्फ़ुज़ तो करसकते हैं। महिकमा अक़ल्लीयती बहबूद केसरबराह मुहम्मद अली रिफ़अत वक़्फ़ बोर्ड के सदर नशीन मौलाना ख़ुसरो पाशाह मसला पर तवज्जा करें तो कुछ होसकता है।