सरकार और हलीफ़ पार्टी आरक्षण नहीं चाहते

हैदराबाद 08 जनवरी: तेलंगाना सरकार और उसकी हलीफ़ पार्टी मुसलमानों को आरक्षण के प्रतिशत में वृद्धि के सिलसिले में किस हद तक गंभीर है? ये वो सवाल है जो इन दिनों मुसलमानों और राजनीतिक दलों में विषय बेहस बना हुआ है। चीफ मिनिस्टर के चंद्रशेखर राव जिन्होंने आम चुनाव से पहले सत्ता मिलते ही 4 माह के अंदर मुसलमानों को 12 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया था।

इसके अलावा दर्ज फ़हरिस्त क़बाईल के आरक्षण को 12 प्रतिशत करने का घोषणा किया गया। सरकार ने पिछले ढाई साल के अवधि में इस वादे के पूरा होने के सिलसिले में कोई गंभीर कोशिश नहीं कि और न ही उसकी हलीफ़ जमात ने उस पर दबाव बनाने की कोशिश की के आरक्षण का वादा पूरा किया जाए।

सुधीर आयोग के क़ियाम के ज़रीये मुसलमानों के शैक्षणिक और आर्थिक पसमांदगी का जायज़ा लिया गया लेकिन जब आयोग ने रिपोर्ट पेश की तो उसे बाक़ायदा कमीशन का मौकूफ़ दिए बिना केवल एक सरकारी कमेटी की रिपोर्ट का दर्जा दिया गया। इस तरह सुधीर आयोग की रिपोर्ट को ग़ैर अहम साबित करने की कोशिश की गई शायद इसलिए कि आयोग ने मुसलमानों को पसमांदगी के आधार पर 9 से 12 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की। साथ ही साथ इस सिलसिले में क़ानूनसाज़ी का मश्वरा दिया गया।

अगर सरकार आयोग की सिफारिशों में गंभीर होती तो वह बीबीसी कमीशन को जिलों का दौरा करते हुए एक रिपोर्ट तैयार करवाती और साथ में मुसलमानों के पसमांदगी दूसरे पिछड़े वर्गों के मुक़ाबले में रिपोर्ट तैयार करती तब जाकर कहीं सिफारिश रिपोर्ट के बाद आरक्षण का घोषणा करती।

सुधीर कमीशन में अगरचे हुकूमत की हलीफ़ जमात के सिफ़ारिश करदा माहिरीन मौजूद थे उस के बावजूद रिपोर्ट की पेशकशी के बाद भी हलीफ़ जमात ने कभी भी हुकूमत को आरक्षण के सिलसिले में रहनुमाई नहीं की। सरकार हर मामले में खुलकर ताईद करने वाली हलीफ़ पार्टी को मुसलमानों की शैक्षिक और आर्थिक तरक़्क़ी से कोई दिलचस्पी नहीं दिखी। जिसका सबूत सुधीर आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करने के लिए ख़ामोशी इख़तियार करना है।