ग़ज़ल (तंज़-ओ-मिज़ाह)

भूले से किसी बात पे हैरान ना होना
महंगाई के हमले से परेशान ना होना

हासिल है अगर क़र्ज़ के मिलने की सहूलत
नेकी के किसी काम से अंजान ना होना

दुनिया को अगर हाथ में रखना है तो प्यारे
दुनिया की किसी शए पे मेहरबान ना होना

इंसान से इंसान के बनते हैं कई काम
मुश्किल है किसी का , कोई एहसान ना होना

अंदाज़-ए-हसद आप का कहता तो यही है
चेहरे पे किसी और के मुस्कान ना होना

रद्दी की दूकानों से चलो जान तो छूटी
अच्छा है मेरा साहिबे दीवान ना होना

अहमद के ख़्यालात किसी से नहीं मिलते
ये बात कहीं सुन के परेशान ना होना

———-अहमद क़ासिमी ( मुग़ल पूरा)