इक्कीसवीं सदी इस्लाम की सदी है, इस दौर में बज़ाहिर इस्लाम मग़्लूब और मुसलमान कमज़ोर नज़र आ रहे हैं, इसके बावजूद इस्लाम मज़बूत और वसीअ होता जा रहा है, उसकी शाख़ें फैलती जा रही हैं, इसके घने साय में परेशान दिल सुकून-ओ-इतमीनान पा रहे हैं। इस्लाम की ये ज़ाहिरी कमज़ोरी दरहक़ीक़त मुसलमानों की कमज़ोरी-ओ-पस्तहिम्मती की वजह से है।
आज हम दुश्मन से जानिबदारी और इंसाफ़ की उम्मीदें वाबस्ता किए हुए हैं और ख़ुद इक़दाम करने और असरअंदाज़ होने के मौक़िफ़ में नहीं हैं। इस्लाम हक़ायक़ पर मबनी, शवाहिद पर मुश्तमिल, माक़ूलीयत से मुत्तसिफ़, हर क़ौम-ओ-ज़माँ के लिए यकसाँ नाफ़िज़ अल-अमल मज़हब है। इस्लाम के क़वानीन में दीन-ओ-दुनिया की कामयाबी-ओ-कामरानी के साथ फ़र्द और मुआशरा दोनों की सआदत मंदी है, इन्फ़िरादी और इजतिमाई दोनों ज़िंदगीयों की ख़ुशहाली की ज़मानत है।
मग़रिब का तरक़्क़ी याफ़ता समाज, जो हर वक़्त जम्हूरियत, राय की आज़ादी और इंसानी आज़ादी की दुहाई देता है, सारी दुनिया को जंग-ओ-जदाल के शिकंजे में फांसे हुए है। मग़रिबी दुनिया में जहां हर फ़र्द को आज़ादी हासिल है, इसके नतीजे में हर फ़र्द में ख़ुदग़र्ज़ी और मुफ़ाद परस्ती का अंसर भी नुमायां है। वो अपने मुफ़ाद के लिए सब्र करेगा, ईसार करेगे और क़ुरबानी देगा, लेकिन दूसरे के मुफ़ाद के लिए वो बिलकुल चश्मपोशी और पहलू तही इख़तियार करेगा।
उसकी वाज़िह मिसाल मग़रिबी दुनिया के अज़दवाजी ताल्लुक़ात हैं। मेरी मुलाक़ात कई मग़रिबी मर्द-ओ-ख़वातीन से हुई है, जो जवानी की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन अज़दवाजी बंधन में नहीं बंधे, जिसका सबब सिर्फ़ नफ़्सपरसती और ख़ुदग़रज़ी है।
गुज़श्ता एतवार को एक पादरी ने मुझे साल नौ की आमद की ख़ुशी में चर्च में मुनाक़िदा एक मज़हबी प्रोग्राम और ज़ुहराना पर मदऊ किया। वहां मेरी मुलाक़ात एक ४५ साला शख़्स से हुई, जो अपने ज़ईफ़ माँ बाप को चर्च लाया था। दौरान गुफ़्तगु मैंने इससे दरयाफ्त किया कि तुम्हारे कितने बच्चे हैं?। इसने बड़ी सादगी से जवाब दिया कि मुझे कोई औलाद नहीं है।
मैंने शादी नहीं की, क्योंकि अब तक मुझे कोई लड़की पसंद नहीं आई।
जिस पादरी ने मुझे दावत दी थी और ख़ुद अपनी गाड़ी में मुझे ले गया था, इस उम्र रसीदा पादरी ने अपने कलबी अफ़सोस का इज़हार करते हुए कहा कि उसकी इकलौती लड़की चालीस साल की हो चुकी है, मगर अब तक इसने शादी नहीं की और हम नवासे और नवासियों के लिए तरस रहे हैं।
इसने कहा कि मेरी लड़की अपने दो तीन ब्वॉय फ्रेंड्स के साथ रही, लेकिन वो उनके साथ अज़दवाजी रिश्ता क़ायम करने पर मुतमईन नहीं हुई।
इस तरह मग़रिबी दुनिया में अक्सर-ओ-बेशतर रिश्ते नाकामी के शिकार हैं,अवाइली ज़िंदगी तबाह है, ख़ानदानी निज़ाम खोखला हो चुका है। इसके बरख़िलाफ़ मुसलमानों का आइली निज़ाम बेहतर है, मियां बीवी के दरमियान मुवाफ़िक़त क़ायम है और दीगर क़ौमों के मुक़ाबिल मुसलमानों का ख़ानदानी निज़ाम कामयाब है।
मग़रिबी दुनिया की नाकामी की अहम वजह ये है कि वहां ज़िना आम है। औरत और मर्द के दरमीयान बाहमी रजामंदी से क़ायम होने वाला ताल्लुक़ क़ाबिल गिरिफ्त नहीं है। कोई मग़रिबी औरत एक ही मर्द पर सारी ज़िंदगी इकतिफ़ा नहीं करना चाहती और कोई मर्द एक औरत से शादी कर के उसकी ज़िम्मेदारीयों को अपने सर नहीं लेना चाहता।
ख़ुदग़रज़ी और नफ़्सपरसती इस क़दर आम हो चुकी है कि उनके मुआशरा में कोई बुराई बाक़ी नहीं रही, बल्कि वो जानवरों की तरह बला फ़र्क़-ओ-इमतियाज़ एक दूसरे के पास आते जाते रहते हैं, जिसके नतीजे में आइली ज़िंदगी की ख़ुशीयों से यकसर महरूम हैं।
-इस्लाम के नज़दीक ज़िना गुनाह कबीरा है, ख़ाह ज़बरदस्ती हो या बाहमी रजामंदी से। इसके मुर्तक़िब फ़ासिक़-ओ-फ़ाजिर और संगीन सज़ा के मुस्तहिक़ हैं।
ज़िनना सिर्फ़ इन्फ़िरादी गुनाह नहीं है, बल्कि ये एक समाजी बुराई है। उसको किसी शख़्स का शख़्सी अमल कह कर नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता, बल्कि वो आइली ज़िंदगी, इंसानी समाज और पूरी इंसानियत के अख़लाक़ी इक़दार के लिए सिम क़ातिल है। इस्लाम ने ना सिर्फ़ ज़िना को हराम क़रार दिया, बल्कि ज़िना के अस्बाब-ओ-अवामिल को भी नाजायज़ क़रार दिया।
अल्लाह तआला का इरशाद है कि और तुम ज़िना के क़रीब मत जाओ, बिलाशुबा ये बेहयाई है और बहुत बुरी राह है। (सूरा बनीइसराईल।३२)
क़ुरआन मजीद के इस हकीमाना उस्लूब पर ग़ौर फ़रमाईए कि क़ुरान-ए-पाक ने ज़िना ना करो नहीं कहा, बल्कि फ़रमाया तुम ज़िना के क़रीब मत जाओ। इस उस्लूब तख़ातब से फुक़हा ने इस्तेदलाल ( दलील) किया है कि हर वो चीज़ जो ज़िना के क़रीब ले जाने वाली है, मसलन अजनबी औरत को छूना, बोसा देना, बिला ज़रूरत गुफ़्तगु करना, बदनिगाही और तन्हाई में मिलना, सब मना और नाजायज़ हैं और उनका मुर्तक़िब गुनाहगार है, उसे तौबा करनी चाहीए।
अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद में ज़िना से बचने वालों की तारीफ़ की और इसके मुरतकिबीन को दोहरे अज़ाब से डराया। इरशाद फ़रमाया और ये वो लोग हैं, जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद की पूजा नहीं करते और ना ही किसी ऐसी जान को क़त्ल करते हैं, जिसे बगै़र हक़ के क़त्ल करना अल्लाह ने हराम फ़रमाया है और ना ही वो ज़िना (बदकारी) करते हैं और जो शख़्स ये काम करेगा वो गुनाह की सज़ा पाएगा, इसके लिए क़यामत के दिन अज़ाब दो गुना कर दिया जाएगा और वो इस में ज़िल्लत-ओ-ख़ारी के साथ हमेशा रहेगा, मगर जिसने तौबा कर ली, ईमान लाया और नेक अमल किया तो ये वो लोग हैं कि अल्लाह जिनकी बुराईयों को नेकियों से बदल देगा और अल्लाह बड़ा बख्शने वाला निहायत मेहरबान है। (सूरत अल फ़ुरक़ान।६८ ता७०)
हुज़ूर नबी करीम स० अ० व० ने ज़िना की हुर्मत बयान करते हुए फ़रमाया कि ज़ानी ज़िना नहीं करता, जब वो ज़िना करता है दरां हालीका वो मोमिन हो (बुख़ारी-ओ-मुस्लिम) दूसरी हदीस शरीफ़ में सरकार ए दो आलम स०अ०स० ने उसकी वज़ाहत करते हुए फ़रमाया कि जब कोई बंदा ज़िना करता है तो इससे ईमान निकल जाता है और वो इसके सिर पर साया की तरह हो जाता है। जब वो (इस बुरे अमल से) अलैहदा हो जाता है तो ईमान उसकी तरफ़ लौट जाता है। (अबू दाउद, तिरमिज़ी, बेहक़ी)
ईमान ऐसा पाकीज़ा-ओ-नफ़ीस जौहर है, जो ज़िना जैसी नापाक-ओ-बदबूदार चीज़ के साथ एक लम्हा भी नहीं रह सकता, गोया ये ईमान की ज़िद है। ईमान के साथ बेहयाई-ओ-बदकारी आग और पानी की तरह एक दूसरे के नक़ीज़-ओ-ज़िद हैं। तफ़सीर रूह अल बयान में सूरा बनी इस्राईल की आयत ३२ की तफ़सीर के ज़िमन में बाअज़ सहाबा किराम से मनक़ूल है कि हुज़ूर नबी अकरम स०अ०व० ने फ़रमाया ज़िना से बचो, क्योंकि इसमें छः बुराईयां हैं, तीन दुनिया में और तीन आख़िरत में। दुनिया में उसकी बुराईयां ये हैं कि उसकी वजह से रिज़्क में कमी होती है यानी बरकत उठ जाती है और वो भलाई से महरूम हो जाता है। उसकी उम्र कम हो जाती है और वो लोगों के दिलों में मबग़ूज़ हो जाता है, इसके चेहरे की रौनक चली जाती है। आख़िरत की बुराईयां ये हैं कि उसकी वजह से अल्लाह तआला का ग़ज़ब इस पर नाज़िल होता है, इसके साथ सख़्त मुहासिबा किया जाता है और उसको दोज़ख़ में डाल दिया जाता है।
इमाम फ़ख़र उद्दीन राज़ी ने तफ़सीर कबीर में मज़कूरा आयत-ए-करीमा की तफ़सीर के तहत ज़िना के अकली तौर पर मफ़ासिद और बुराईयों का ज़िक्र करते हुए बयान किया है कि उसकी वजह से नसब मुश्तबा हो जाता है, मालूम नहीं होता कि औलाद शौहर से है या किसी ग़ैर से और वो औलाद के ज़या का भी मूजिब होता है, नस्ल मुनक़ते हो जाती है और इसी ज़िना की वजह से बहुत से क़त्ल भी होते हैं।
ज़िना की वजह से मियां बीवी के दरमियान उलफ़त-ओ-मुहब्बत ख़त्म हो जाती है और इससे इंसान और चौपाइयों में कोई फ़र्क़ बाक़ी नहीं रहता। ख़ानदानी निज़ाम दिरहम ब्रहम हो जाता है, क्योंकि औरत से मक़सूद सिर्फ़ ख़ाहिश नफ़्स की तकमील नहीं होती, बल्कि वो आदमी की शरीक-ए-हयात होती है।
उमूर ख़ानादारी और दीगर घरेलू ज़िम्मेदारीयों में वो मर्द के शरीक होती है। नीज़ इना ज़िल्लत-ओ-ख़ारी का सबसे हक़ीरतरीन ज़रीया है, क्योंकि लोगों के दरमियान सबसे क़बीह तरीन गाली इससे मुताल्लिक़ होती है।
हुज़ूर नबी अकरम स०अ०व० ने इरशाद फ़रमाया कि जब किसी गांव (इलाक़ा) में ज़िना और सूद ज़ाहिर होता है तो अल्लाह तआला उसकी हलाकत की इजाज़त दे देता है (अबू याली बरीवायत हज़रत अब्दुल्लाहबिन मसऊद रज़ी०) उसी की एक रिवायत में है कि जिस क़ौम में बदकारी और सूद ज़ाहिर हो जाता है, वो क़ौम अपने ऊपर अल्लाह के अज़ाब को हलाल कर लेती है।
आज के मुहज़्ज़ब इंसानी मुआशरा ने ज़िना को दो ख़ानों में तक़सीम कर दिया है
(१) ज़िना बिलजब्र और (२) ज़िना बॉलर ज़ा। ज़ना बॉलर ज़ा उनके नज़दीक क़ाबिल गिरिफ्त नहीं रहा, बल्कि वो आम कल्चर और फ़ैशन बन चुका है, अलबत्ता उसकी बुराई इस हद तक बरक़रार है कि बीवी, शौहर के ज़िना की शिकायत करे या शौहर बीवी के ग़ैर मर्द से ताल्लुक़ात पर नाराज़ हो तो ये तलाक़ की क़ानूनी वजह बन सकती है।
लेकिन इस्लाम के नज़दीक ज़िना बिलजब्र और ज़िना बॉलर ज़ा दोनों समाज के लिए हलाकत ख़ेज़ बीमारीयां हैं। अगरचे ज़िना बिलजब्र की शिद्दत ज़्यादा है, लेकिन ज़िना बॉलर ज़ा भी काबिल नजरअंदाज़ नहीं है। इस्लाम की नज़र में मुतलक़ ज़िना के मुरतकिबीन यकसाँ सज़ा के हक़दार हैं। अगर ज़िना के मुरतकिबीन ग़ैर शादीशुदा हों तो उनको सौ कोड़े मारे जाऐंगे और अगर वो शादीशुदा हों तो उन को बरसर-ए-आम संगसार किया जाएगा।
अल्लाह तआला का इरशाद है कि बदकार औरत और बदकार मर्द (अगर ग़ैर शादीशुदा हों) तो इन दोनों में से हर एक को सौ कोड़े मॉरो (और याद रहे कि) तुम्हें अल्लाह के दीन (के इजराई) के मुआमला में इन दोनों पर ज़र्रा बराबर भी तरस ना आए। अगर तुम अल्लाह तआला और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो तो चाहीए कि इन दोनों की सज़ा के मौक़ा पर मुसलमानों की एक जमात मौजूद हो (सूरत उल-नूर।२) शादीशुदा ज़िनाकारों को संगसार करने का हुक्म सुन्नते मुत्वातिरा से साबित है। हुज़ूर नबी अकरम स०अ०व० ने इस सज़ा को बरसर-ए-आम जारी फ़रमाया और आप ( स०अ०व०) के बाद ख़ुलफ़ाए राशिदीन ने उसको अलल-ऐलान नाफ़िज़ किया।
दिल्ली इस्मत रेज़ि वाक़िया के मुजरिमीन को सख़्त से सख़्त सज़ा देने की अपील की जा रही है, कोई सज़ाए मौत का मुतालिबा कर रहा है और कोई कीमीयाई तरीक़े से नामर्द बनाने और तीस साल सज़ा की तजवीज़ पेश कर रहा है। बहर-ए-कैफ़ इस्लामी नुक़्ता-ए-नज़र से ये जुर्म निहायत संगीन और नाक़ाबिल माफ़ी है। ये वहशियाना अमल सारी इंसानियत के लिए बदनुमा दाग़ है और इस तरह के वाक़ियात का सद्द-ए-बाब सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लामी सज़ा के नफ़ाज़ से ही हो सकता है। अगर मुजरिमीन ज़िना बिलजब्र का इक़रार कर लेते हैं और अपने इक़बाली बयान से मुनहरिफ़ नहीं होते हैं, या फिर चार ऐनी शाहिदीन उनके मख़सूस अमल बद का बचशम ख़ुद मुशाहिदा का हलफ़िया बयान देते हैं तो ऐसी सूरत में इन ख़ातियों को दिल्ली की शाहराह पर बरसर-ए-आम संगसार करना चाहीए, ताकि आइन्दा किसी वहशी इंसान को इस अमल बद की जुर्रत ना हो।
क्योंकि क़ुरान-ए-पाक ने ज़ोर दिया है कि इस जुर्म के साबित होने पर उसकी सज़ा को नाफ़िज़ करने में तुम्हें ज़रा भी तरस नहीं आनी चाहीए और इबरत के लिए ये सज़ा बरसर-ए-आम दी जानी चाहीए।