हैदराबाद: मक्का मस्जिद हमले में कई मुस्लिम युवाओं पर ‘आतंकवाद’ से जुड़े आरोप लगे थे. लेकिन बाद में कई युवाओं को निर्दोष पाया गया था. जिन्हें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने आंध्रप्रदेश सरकार से मुआवज़ा देने की सिफ़ारिश भी की थी. वहीँ देश के मुस्लिम नौजवानों का कहना है कि इस्लाम में चरमपंथ की कोई जगह नहीं है आतंकवाद से सिर्फ मुसलमानों का नाम जोड़ा जाना सही नहीं है.
बीबीसी हिंदी के मुताबिक, मक्का मस्जिद, मालेगांव, अक्षरधाम, मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद कहीं भी कोई धमाका हो, भारत के मुसलमानों में घबराहट फैल जाती है. फोन की घंटियां बजनी शुरू हो जाती हैं, मां अपने बच्चों को घर से बाहर न निकलने की हिदायत देती हैं. ऐसा इसलिए है कि हर धमाके के बाद आम तौर पर मीडिया में मुसलमानों का नाम आता है.
आपको बता दें कि 2007 में हैदराबाद शहर के केंद्र में चार मीनार के पास मक्का मस्जिद में हुए बम धमाके के बाद हिरासत में लिए जाने वाले डॉक्टर इब्राहीम जुनैद ने बताया कि उनके साथ सौ लड़कों को कैसे उठाया गया और उनके साथ क्या सलूक किया गया, ये किसी को नहीं पता. उन्होंने बताया कि हिरासत में लिए जाने के बाद वहां पहले से एक कहानी तैयार होती है जिसे आपको कबूल करने के लिए कहा जाता है. उनहोंने यह भी कहा कि मुसलमानों का आतंकवाद से संबंध नहीं है लेकिन उन्होंने पुलिस का आतंक जरूर देखा है.
बता दें कि देश के मुस्लिम नौजवानों का कहना है कि इस्लाम में चरमपंथ की कोई जगह नहीं है और वे इस तरह की घटनाओं की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं.
रुख़सार अंजुम हैदराबाद के एक यूनिवर्सिटी की छात्रा हैं. उनका कहना है हम आतंकवाद का किसी भी सूरत में समर्थन नहीं करते हैं. यहां आतंकवाद में मुसलमानों का नाम लिया जाता है लेकिन मुसलमानों का आतंकवाद से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है.
इसी प्रकार अब्दुल अज़ीम ख़ान ने बताया, जब भी कोई चरमपंथी घटना होती है उसमें मुसलमानों का नाम सामने आता है, पहले उनका नाम आईएसआई से, इंडियन मुजाहिदीन, तथा सिमी के नाम से जोड़ा जाता था,और अब आईएस के नाम से जोड़ा जाता है. अभी हाल ही में हैदराबाद से सात बच्चों को उठा लिया गया और उनका संबंध इस्लामिक स्टेट से बताया जा रहा है. यह मुसलमानों की छवि खराब करने की कोशिश है.