आखिर भीम आर्मी का क्या है?

सहारनपुर: जिस तरह से भीम आर्मी संगठन पर माहौल खराब करने के आरोप लग रहे हैं वह जिले में ज्यादा पुराना नहीं हैं, लेकिन उसने दलित बहुल इलाकों में अपनी पहुंच जरूर बना ली हैं। संगठन की चाह है कि वह महाराष्ट्र की शिवसेना की तर्ज पर ताकतवर बने और दलितों पर होने वाले अत्याचार का जवाब उन्हीं की तर्ज पर दें। संगठन की महिला विंग भी है। भीम आर्मी का गठन दस साल पहले सहारनपुर में ही होना बताया गया है। चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण खुद को इसका संस्थापक अध्यक्ष बताते हैं। वह शहर के एक कॉलेज में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर भी आंदोलन कर चुके हैं।

संगठन ने 2014 में सहारनपुर के देहरादून रोड बडतौली गांव के बाहर एक बोर्ड लगाया। नौजवान रजत कुमार ने अपनी जाति को दर्शाते हुए बोर्ड पर-‘दे ग्रेट चमार’ लिख दिया। ऐसा लिखने के पीछे भी बराबरी दर्शाना मकसद बताया जा रहा है। सहारनपुर में एक संगठन ऐसे ‘दे ग्रेट राजपुताना’ को यह बोर्ड बुरा लगा तो आरोप है कि रजत के लगाए बोर्ड पर कालिख पोत दी गई। विवाद बढ़ने पर मारपीट हो गई थी। बाद में आंबेडकर की मूर्ति पर कालिख पोत दी गई। इस सूचना पर भीम आर्मी के सदस्य कालिख पोतने वालों से भिड़ गए काफी संघर्ष हुआ जिसमें लोग जख्मी हुए और कई लोगों पर मुकदमे हुए। लेकिन भीम आर्मी अपने काम में लगी रही। हालांकि सहारनपुर जिले में ही इस संगठन के दस हजार से ज्यादा सदस्य होने का दावा पदाधिकारी करते हैं। जिले का अध्यक्ष कमल कुमार हैं। संगठन का दावा है कि महिलाएं भी बड़ी संख्या में संगठन से जुड़ रही हैं। पहले महिला विंग भी थी, जिसकी कमान ममता नाम की महिला के हाथ में थी। लेकिन राजनीति में सक्रिय होने की वजह से उन्हें संगठन से निकाल दिया गया। संगठन के अध्यक्ष चंद्रशेखर का कहना है कि सहारनपुर की घटना सुनियोजित नहीं थी। दलितों को दबरन रोकने से जगह-जगह लोग गुस्सा होकर बाहर निकले। विवाद पुलिस के लाठीचार्ज के बाद हुआ। डीएम एनपी सिंह का कहना है कि भीम आर्मी से जुड़े लोगों ने ही विवाद को बढ़ाया। सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाईं। दोषियों के खिलाफ हर हाल में कारर्वाई होगी।