भीमा-कोरेगांव: आखिर क्यों नहीं जश्न मनाए दलित?

भीमा-कोरेगांव: आखिर क्यों नहीं जश्न मनाए दलित?

बता दें कि बीते साल 1 जनवरी को इसी इलाके में भीमा कोरेगांव हिंसा की 200वीं बरसी पर हुए श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान भारी हिंसा हुई थी। 1 जनवरी को पुणे से 40 किलोमीटर दूर कोरेगांव-भीमा गांव में दलित समुदाय के लोगों का एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था, जिसका कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने विरोध किया था।

इसी कार्यक्रम के दौरान इस इलाके में हिंसा भड़की थी, जिसके बाद भीड़ ने वाहनों में आग लगा दी और दुकानों-मकानों में तोड़फोड़ की थी। इस हिंसा में एक शख्स की जान चली गई और कई लोग जख्मी हो गए थे। इस घटना के एक साल पूरे होने और भीमा कोरेगांव संघर्ष की 201वीं वर्षगांठ के मद्देनजर मंगलवार को भी यहां एहतियात के तौर पर कड़े सुरक्षा इंतजाम रहे।

इस बारे में जानकारी देते हुए महाराष्ट्र पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि जातिगत संघर्ष और हिंसा की आशंकाओं के मद्देनजर मंगलवार को भीमा-कोरेगांव और आसपास के हिस्सों में 5 हजार पुलिसकर्मी, 1200 होमगार्ड और राज्य रिजर्व पुलिस बल की 12 कंपनियां तैनात रहीं।

वहीं पुलिसकर्मियों की तैनाती के साथ ही 500 सीसीटीवी कैमरे, 11 ड्रोन कैमरे और 40 विडियो कैमरों को भी कार्यक्रम की निगरानी के लिए लगाया गया। सुरक्षा के तमाम इंतजामों के बीच इलाके में मंगलवार को इंटरनेट सेवाएं भी स्थगित रहीं।

मंगलवार को हुए कार्यक्रम के दौरान डॉ. भीमराव आंबेडकर के पौत्र और दलित नेता प्रकाश आंबेडकर ने जय स्तंभ पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। स्मारक पर पुष्प चक्र अर्पित करने के बाद आंबेडकर ने उम्मीद जताई कि कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि पिछले साल के विपरीत इस बार आसपास के गांवों के लोग कार्यक्रम के दौरान मदद उपलब्ध करा रहे हैं। प्रकाश आंबेडकर के अलावा महाराष्ट्र के कई अन्य दलित नेताओं ने भी यहां पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

साभार- ‘नवभारत टाइम्स’

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