106 साल का बिहार: निर्माण और तरक्की में ऊर्दू अखबारों और मुसलमानों ने निभाई अहम भूमिका!

बिहार के इतिहास के बगैर भारत का इतिहास अधूरा है।बिहार के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने, उन्हें संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि परंपरा को प्रगति से जोड़ कर इतिहास को आगे ले जाया जा सके। आखिर इतिहास सिर्फ पढ़ने नहीं, बल्कि समाज को समझने और उसे बदलने का भी उपकरण है।

अपने अतीत को जानना इसलिए जरूरी है कि इससे हमें गौरव बोध होता है और भविष्य गढ़ने में मदद मिलती है। गौरवशाली इतिहास हमें प्रेरणा देता है, तो कोई काल खंड गलतियां न दोहराने का सबक भी देता है। बिहार लंबे समय तक भारत की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है।

1912 में बंगाल प्रांत से अलग होने के बाद बिहार और उड़ीसा एक समवेत राज्य बन गए, जिसके बाद भारतीय सरकार के अधिनियम, 1935 के तहत बिहार और उड़ीसा को अलग-अलग राज्य बना दिया गया। 1947 में आजादी के बाद भी एक राज्य के तौर पर बिहार की भौगौलिक सीमाएं ज्यों की त्यों बनी रहीं।

बिहार राज्य की तरक्की और निर्माण में मुसलमानों का अहम किरदार रहा, और उर्दू अखबारात ने नई पहचान दिलाई । 7 फरवरी 1876 ईस्वी में मुंगेर से प्रकाशित होने वाले उर्दू अखबार “मुर्गे़ सुलेमान” ने “बिहारियों के लिए बिहार”और “रग रग में बिहार” जैसा स्लोगन दिया। और इसकी बुनियाद पर बिहारियों के अंदर एक नया जोश खरोश पैदा हुआ।
सच्चिदानंद सिन्हा अली इमाम और महेश नारायण की कोशिशों से पहले, उर्दू अखबारात ने बिहार को अलग राज्य बनाने का प्रयास शुरू किया।

1847 ई0 के साप्ताहिक उर्दू पत्रिकार “नादिर उल अखबार” ने बंगाल सुबे में बिहारियों के साथ हो रहे भेदभाव को उजागर किया।
जबकि 1877 ई० में उर्दू पत्रिका”क़ासिद” ने बिहार बंगाल के एक साथ होने के तअल्लुक से लिखा कि बिहार और बंगाल का एक साथ होना वैसा ही है जैसे इंग्लैंड और फ्रांस को मिला देना।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि बिहार से प्रकाशित होने वाला सबसे पहला अखबार उर्दू था। 1253 ई.में प्रकाशित होने वाला उर्दू अखबार नूरुल अनवर था।

अली इमाम अपने समय के नामवर वकीलों में शुमार किए जाते थे ।
लॉ मेंबर बनाने के लिए सच्चिदानंद सिन्हा और उनके दीगर साथियों ने अली इमाम से बात की, पहले तो वह अपने प्रेक्टिस को लेकर इनकार करते रहे ।

लेकिन बाद में इसको स्वीकार किया ,और अपना फर्ज़ बखूबी निभाया।
मुख्यमंत्री को पहले प्रीमियर कहा जाता था।1937 में हुए प्रांतीय चुनाव के बाद मुस्लिम इंडिपेंडेंट पार्टी के अध्यक्ष के रूप में मोहम्मद यूनुस ने कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव लड़ा । और राज्य के 40 मुस्लिम सीटों में से 20 सीटों पर जीत हासिल की।

चुनाव के बाद गवर्नर से मतभेद की वजह से कांग्रेस ने सरकार नहीं बनाई, तो 1 अप्रैल 1937 से 19 जुलाई 1937 तक बिहार के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) मोहम्मद यूनुस रहे।

मुगल काल के बाद यह शहर गुमनाम हो गया था । शेरशाह सूरी ने इसको नए सिरे से आबाद किया।मध्यकालीन इतिहास में बिहार खास है।मुगल काल में दिल्ली सत्ता का केंद्र बन गया, तब बिहार के एक शासक शेरशाह सूरी काफी लोकप्रिय हुए। आधुनिक मध्य-पश्चिम बिहार का सहसराम शेरशाह सूरी का केंद्र था।

शेरशाह सूरी को उनके राज्य में हुए सार्वजनिक निर्माण के लिए भी जाना जाता है।एक किला भी बनवाया था जिसका नामोनिशान तो बाकी नहीं है। लेकिन उन की बनाई हुई मस्जिद आज भी शाद व आबाद है।

आज भी भारत ही नहीं बल्कि इंडोनेशिया, मालदीप, सेशेल्स मॉरिशस ,नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों की करेंसी रुपया है । इस रूपए का निर्धारण सबसे पहले बिहारी शासक शेरशाह सूरी ने किया था।

उन्होंने तय किया था कि 178 ग्रेन का चांदी का सिक्का रुपया कहा जाएगा ,और कॉपर का सिक्का पैसा कहां जाएगा ।उनके ही जमाने में तय हुआ था कि 169 ग्रेन सोने के सिक्के को महर कहा जाएगा। इससे पहले किसी भी चांदी के सिक्के को रुपया कहा जाता था।

मुंगेर मुगल काल से ही हथियार निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहा है । 1820 में प्रकाशित पुस्तक हिंदुस्तान एंड द एड्जसेंट कंट्रीज मैं वाल्टर हेमिल्टन लिखते हैं कि मुंगेर में लोहारों के 40 घर हैं जो बेहतरीन गुणवत्ता के हथियार बनाते हैं । यहां डबल बैरल गन ₹32 में राइफल ₹30 में मस्कैटस ₹8 में और पिस्टल ₹10 में मिल जाता है।

खान बख्श किताब प्रेमी थे ,और उनकी ख्वाहिश थी एक लाइब्रेरी की तामीर हो, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सके। जबकि उन के बेटे खुदा बख्श ने 1891 खुदा बख्श लाइब्रेरी की स्थापना की। जिसमें देश दुनिया की 4000 से ज्यादा चुनिंदा और नायाब किताबें मौजूद हैं।

भारत की आजादी के लिए शुरू की गई “सत्याग्रह तहरीक” बिहार के इंकलाबी सर जमीन चंपारण से शुरू हुई। और 1917 ईस्वी में मोहन दास कर्मचंद गांधी चंपारण आए । और यहीं से इस अभियान को शुरू किया। इस दौरान अंग्रेजों ने दूध में जहर मिलाकर गांधी जी को पेश किया तो उस वक्त बत्तख मियाँ अंसारी ने अपनी जान हथेली पर रखकर गांधी जी की हिफाज़त की और उन की जान बचाई।

कश्मीर की कली, यह रात फिर ना आएगी, और किस्मत, जैसी फिल्मों के मशहूर गीत लिखने वाले गीतकार शमसुल होदा बिहारी का जन्म आरा में हुआ था।

‘अनीसुर रहमान चिश्ती’ (मोतिहारी, बिहार)