ख़ुद को बदलने के बजाय हमारे उलेमाओं ने इस्लाम को ही बदल दिया!

ख़ुद को बदलने के बजाय हमारे उलेमाओं ने इस्लाम को ही बदल दिया!

तलाके बिद्दत जो मुस्लिम समाज में एक कुरीति थी, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने उसे अमान्य करार दे दिया है. मस्जिदों में औरतों के लिए लगी अघोषित पाबंदी भी बिल्कुल इसी तरह की एक कुरीति है. अगर मुस्लिम औरतें इस मामले में भी अदालत का दरवाजा खटखटाएं तो उन्हें बिना किसी रोक-टोक के मस्जिदों में जाने और इबादत की आजादी मिल सकती है.

बचपन में एक बार मुझे और मेरे छोटे भाई को एक साथ चेचक निकल आई. घरवाले इलाज के लिए डॉक्टर के पास ले गए लेकिन उनका मानना था कि जल्दी रिकवरी के लिए हम दोनों को दवा के साथ-साथ दुआ की भी जरूरत है.

तब हमारा घर नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में था. हम दोनों को एक मस्जिद में दुआ के लिए ले जाया गया. मगर मस्जिद पहुंचने पर छोटा भाई तो अंदर गया लेकिन मुझे बाहर खड़ा रखा गया. थोड़ी देर बाद मौलाना साहब ने मस्जिद की चौखट पर आकर मुझे देखा, कुरआन की कुछ आयतें बुदबुदाईं, मुझपर फूंक मारी और हम घर वापस गए. मेरी याद्दाश्त में ये पहला मौका था जब लड़की होने के नाते मुझे फर्क महसूस हुआ. खैर, अगले कुछ दिन में चेचक खत्म हो गई और मस्जिद में हुए भेदभाव पर भी मैंने कोई जोर नहीं दिया.

ऐतिहासिक इमारतों से मेरा खासा लगाव है. मौका निकालकर दिल्ली की पुरानी इमारतें देखने मैं अक्सर निकल जाया करती हूं. एक दफा सूरज ढलने के बाद जब मैं पुरानी दिल्ली की जामा मस्जिद गई तो मुझे फिर लड़की होने का एहसास कराया गया.

जामा मस्जिद के गेट नंबर एक के दरवाजे पर बैठे बुजुर्ग जिनके हाथ में डंडा भी था, उन्होंने लगभग डांटकर कहा- ‘मग़रिब के बाद औरतों को यहां आने की इजाजत नहीं है.’ मुझे बुरा लगा क्योंकि मर्दों की आवाजाही बिना किसी रोक-टोक के वहां जारी थी.

19वीं सदी में भोपाल की नवाब शाह जहां बेगम ने अपनी रियासत में एक आलीशान मस्जिद ताज-उल-मसाजिद की नींव रखी और उनकी बेटी सुल्तान जहां बेगम की हुकूमत में भी इसकी तामीर का काम चलता रहा. मस्जिद के अंदर एक जनाना भी बनाया गया जहां मर्दों के साथ-साथ औरतों के लिए इबादत का इंतजाम है.

बीते साल जब मेरा इस मस्जिद में जाना हुआ तो इसके मेन दरवाजे के दोनों खंभों पर दो बोर्ड नजर आए. एक बोर्ड पुरातत्व विभाग का था जिसपर ताज-उल-मसाजिद के निर्माण से जुड़ी जानकारियां हैं. बोर्ड पर यह भी लिखा था, ‘मस्जिद के आंतरिक उत्तरी भाग में ज़नाना हिस्सा है जहां पर्दानशीं महिलाएं नमाज़ अदा कर सकती हैं.’ मगर दूसरे खंभे पर जो छोटा बोर्ड टंगा दिखा, उसपर लिखा था- ‘मग़रिब के बाद औरतों का अंदर आना मना है.’

मस्जिद घूमते हुए जब मैं ज़नाने हिस्से की ओर गई तो पाती हूं कि वहां लोहे के दरवाजे पर बड़ा-सा ताला लटका है. मैंने दरवाजे में बनी जालियों से अंदर झांका जिसकी फर्श पर लाल रंग की कालीन बिछी थी. इस हिस्से को देखकर यह तो साफ हो चुका था कि अब यहां औरतें नमाज नहीं पढ़तीं. यह हिस्सा सिर्फ मस्जिद घूमने आने वालों की नुमाइश के लिए सजाकर रखा गया है.

मगर पिछले महीने जब मेरा केरल जाना हुआ और वहां की ऐतिहासिक चेरामन जुमा मस्जिद में मुझे अंदर जाने से रोका गया तो मैं लगभग गुस्से से भर गई. चेरामन जुमा मस्जिद मुहम्मद साहब के जमाने में वजूद में आई और यह हिंदुस्तान की पहली मस्जिद है. लिहाजा, इसे देखने के लिए मैं काफी रोमांचित थी लेकिन यहां भी मेरे लिए पाबंदी थी.

मैं थोड़ी मायूस थी लेकिन उससे ज्यादा गुस्सा से भरी हुई. मैंने मस्जिद प्रबंधन से कहा कि जब कुरआन में ऐसी कोई पाबंदी नहीं तो मुझे अंदर जाने से क्यों रोका जा रहा है. मगर सामने वाले ने मेरे इस जरूरी सवाल पर हंसकर कहा, ‘यहां तो हमेशा से ऐसा ही है.’

इसके बाद मैं मस्जिद के कैंपस में घूमती रही. वहां मौजूद एक पुराने तालाब के पास बैठी, कबूतरों को दाने खिलाए, झांककर मस्जिद के अंदर का जायजा लिया और वापस लौट आई.

उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत के कई हिस्सों में घूमने से मुझे पता चला हिंदुस्तान की मस्जिदों में औरतों की नमाज के लिए कई तरह के नियम हैं. किसी मस्जिद में औरतों के जाने पर पूरी तरह पाबंदी है तो कहीं सूरज ढलने के बाद वे अंदर नहीं जा सकतीं.

मगर बीजापुर, भोपाल, जौनपुर, हुगली, वड़ोदरा समेत कई शहरों में ऐसी मस्जिदें अभी भी हैं जिनका निर्माण 14वीं सदी से लेकर 20वीं सदी तक होता रहा और जहां औरतों की इबादत के लिए ज़नाने बनाए गए. दिल्ली के कुतुब कॉम्पलेक्स में मौजूद ऐतिहासिक मस्जिद कुव्वतुल इस्लाम में भी ज़नाना मौजूद है. लेकिन ये ज़नाने अब वीरान हैं और औरतें बमुश्किल दिखती हैं. 21वीं सदी में इस बुराई ने भारतीय मुस्लिम समाज को अपनी गिरफ्त में ले लिया है.

इसकी वजह क्या है? लखनऊ की रहने वाली और फिलहाल दक्षिण भारत में नौकरी कर रही वरीशा सलीम कहती हैं, ‘भारत एक मर्दवादी समाज है और मुसलमान भी इससे अछूते नहीं हैं. इस्लाम की गलत व्याख्या करके मुस्लिम समाज ने एक कुरीति को अपनी औरतों पर थोप दिया है.’

दुनियाभर में इस्लाम को मानने वाले खुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन दरअसल वे आपस में बुरी तरह बंटे हैं. अतीत में समझ और सहूलियत के आधार पर कई तरह के इस्लामिक़ कानून बने और उसी आधार पर मुसलमान कई फिरकों में बंटे गए.

आठवीं और नौवीं सदी में सुन्नी मुसलमानों के बीच चार बड़े मजहबी रहनुमा हुए. ये चार रहनुमा इमाम अबू हनीफा, इमाम शाफई, इमाम हंबल और इमाम मालिक हैं. इन इमामों ने अपनी-अपनी समझ के आधार पर इस्लामिक कानून की व्याख्याएं की हैं. दुनियाभर में सुन्नी मुसलमान इनके ही बनाए इस्लामिक कानून को मानते हैं.

हिंदुस्तान के बहुसंख्यक सुन्नी मुसलमान इमाम अबु हनीफ़ा के समर्थक हैं और मस्जिदों में औरतों के जाने पर लगी पाबंदी की जड़ें इमाम अबु हनीफ़ा की एक हिदायत में मिलती है. उनकी एक रूलिंग कहती है, ‘चूंकि हदीस में कहा गया है कि औरतों को घर में नमाज पढ़ने से ज्यादा सबाब मिलता है तो उन्हें घर में ही नमाज पढ़ना चाहिए. उन्हें मस्जिद नहीं आना चाहिए.’

वरीशा कहती हैं, ‘मौजूदा दौर के उलेमा जब इमाम अबु हनीफ़ा की इस रूलिंग को पढ़ते हैं तो फौरन इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि जरूर औरतें मर्दों को बहकाती हैं, इसलिए उन्हें मस्जिद में आने से रोकना चाहिए. लेकिन हमारे उलेमाओं के साथ समस्या यह है कि वे इस्लामिक हिदायतों के फलसफे को समझने की कोशिश ही नहीं करते, वे फौरन किसी नतीजे पर जंप कर जाते हैं.’

वरीशा का मानना है कि इमाम अबु हनीफ़ा की हिदायत औरतों के खिलाफ नहीं है. उन्होंने बुज़ुर्ग औरतों को फज्र, मग़रिब और इशा की नमाज मस्जिद में नमाज पढ़ने की छूट दी थी. उन्होंने मस्जिद में औरतों को कभी रोका नहीं जिस तरह मौजूदा दौर की मस्जिदों में रोका जा रहा है. उनके शागिर्दों और बाद में हुए इमामों की रूलिंग्स में भी मस्जिद में औरतों के जाने की पाबंदी के निशान नहीं मिलते हैं.’

दिल्ली माइनॉरिटी कमीशन के चेयरमैन और इस्लामिक मामलों के जानकार डॉक्टर जफरुल इस्लाम कहते हैं कि यह कानून अल्लाह का नहीं इंसानों का बनाया हुआ है. जिस तरह हाजी अली दरगाह में जाने के लिए मुस्लिम औरतों ने अदालत की मदद ली, उसी तरह उन्हें मस्जिदों में प्रवेश पाने के लिए भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए. ज़फरुल इस्लाम कहते हैं कि कम से कम उलेमाओं को मक्का में मर्द और औरतों को साथ नमाज पढ़ते हुए देखकर कुछ सीख लेना चाहिए.

कई मुल्कों में घूम चुकी पत्रकार शीबा असलम फहमी इस्लामिक मामलों की जानकार भी हैं. वो बताती हैं, ‘ईरान, तुर्की, मलेशिया हो या फिर अमेरिका, कनाडा, लंदन, यहां की मस्जिदों में औरतें भी नमाज पढ़ती हैं. कुआलालंपुर की एक मस्जिद में बाकायदा क्रच का इंतजाम है जहां औरतें अपने बच्चों को खिलौनों के बीच छोड़कर नमाज पढ़ती हैं.

शीबा यह भी जोड़ती हैं, ‘इस्लाम में सेग्रिगेशन पर जोर दिया गया है जोकि जरूरी और अच्छी बात है. जिस तरह लड़कियों के लिए स्कूल, कॉलेज अलग कायम किए जाते हैं, मेट्रो में उनकी सहूलियत के लिए अलग कंपार्टमेंट होता है, उसी तरह इस्लाम में मर्द और औरत के अलगाव पर जोर दिया गया है. मगर भारतीय मुसलमानों ने इस बारीकी नहीं समझा. इन्होंने खुद को तब्दील करने की बजाय इस्लाम को ही बदल दिया.

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रोफेसर हुसैन अब्बास कहते हैं, ‘दुनियाभर में इस्लाम का पतन और उसके बारे में फैले भ्रम की एक बड़ी वजह धर्मशास्त्रियों द्वारा इस्लाम के पैगाम को गलत तरीके से पेश करना है. इसीलिए मशहूर शायर डॉक्टर इक़बाल ने इस्लाम को मुखातिब करके कहा, ‘बाक़ी ना रही तेरी वो आईना ज़मीरी, ऐ कुश्ता-ए-मुल्लई-ओ-सुल्तानी-ओ-पीर.’

(ये लेख न्यूज़ एंकर फ़राह खान ने फर्स्ट पोस्ट के लिखा है, सियासत हिंदी ने साभार देते हुए प्रकाशित किया है)

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