
आयशा (रज़ि) रिवायत करती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कभी भी पुरे महीने रोज़े नहीं रखे, सिवाए रमज़ान के महीने के और किसी महीने में इतने रोज़े नहीं रखे, जितने रोज़े शाबान के महीने में रखा करते थे. (सही बुखारी,1969)
इस हदीस से हमें यह पता चलता है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान के लिए अपने आप को तैयार करते थे और उससे पहले महीने (शाबान) में ज़्यादा रोज़े रखते थे.
अबू तलहा रिवायत करते हैं कि अपने वालिद से कि उनके वालिद (तलहा के दादा) ने फ़रमाया कि जब भी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नया चाँद देखते वो हमेशा अल्लाह से दुआ करते और कहते, “ऐ अल्लाह हम पर यह चाँद अमन,ईमान सलामती और इस्लाम के साथ उगा,मेरा रब और तेरा रब अल्लाह है.”
और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान से पहले यह कहा करते थे:
ऐ लोगो यह बरकत वाला महीना तुम्हारे नज़दीक आ रहा है और अल्लाह ने यह हुक्म दिया है कि तुम इस महीने में रोज़े रखो,इस महीने में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं और जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को जकड़ दिया जाता है, और इस महीने में एक रात है जो हज़ार महीनों से बेहतर है, जो इस महीने में अल्लाह की बरकत से महरूम रहा वह सच में एक महरूम शख्स है.( मुसनद इमाम अहमद-7148)
इससे हमें यह पता चला कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस महीने का स्वागत करते थे और इस महीने की बरकत के खुशखबरी सुनाते थे, अल्लाह से दुआ है कि वो हमें इस सारी सुन्नतों पे अमल करने की तौफीक दे..आमीन