चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के मौके पर सरकार के प्रायोजित कार्यक्रम से इतर देश के कुछ प्रबुद्ध लोगों और समाजिक संगठनों ने पांच सितम्बर से चंपारण सत्याग्रह शताब्दी यात्रा की शुरुआत मुज़फ्फरपुर से की है जो अगले २४ सितम्बर को चंपारण (मोतिहारी) में ख़त्म होगी।
पटना स्थित ए एन सिन्हा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के पूर्व निदेशक और गांधीवादी डॉ. डी एम दिवाकर कहते हैं, ‘नेताओं की कोशिश इन आयोजनों के जरिये जनता में अपनी भ्रम वाली छवि पैदा करना है। इसके ज़रिये वे सत्ता हासिल करते हैं और फिर इसे बनाए रखने की कोशिश करते हैं।’
इस यात्रा का उद्देश बताते हुए समाज सेवी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पूर्व छात्र संगठन मुम्बई के अध्यक्ष और सेवक फाउंडशन के चेयरमैन तनवीर आलम ने कहा की गांधी जिस अंतिम आदमी की बात करते थे वह आज भी उतना ही जूझ रहा है जितना आज़ादी से पहले।
यात्रा के पूर्व आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जाने माने एक्टिविस्ट और राष्ट्र सेवा दल के अध्यक्ष सुरेश खैरनार ने कहा की गांधी का चंपारण सत्याग्रह भारत में अंग्रेजों के खिलाफ किया गया पहला सफल आन्दोलन था लेकिन विडंबना ये है की आज सौ साल बाद भी किसानों की हालत में कोई ठोस सुधार नहीं आया है।
यात्रा के संयोजक और राष्ट्र सेवा दल के राष्ट्रीय महामंत्री शाहिद कमाल कहते हैं” 70 साल की आज़ादी के बाद भी हमारी सरकारों ने कभी स्थायी निदान का उपाय नहीं सोचा और राहत के लूट का खेल चलाती रही ,अब समय आ गया है की राहत नहीं बाढ़ के स्थायी निदान के संबन्ध में सोचें, बाढ़ का कारण नेपाल है ऐसा कहकर लोगों को बेवकूफ बनाने का काम बंद होना चाहिए।
नशा मुक्त भारत के राष्ट्रीय संयोजक, पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम ने कहा की अब समय आ गया है की झूठ को झूठ कहा जाए। देश के प्रधानमन्त्री ने जगह जगह झूठ बोला है। नोटबंदी पर झूठ, जनधन पर झूठ, जनता से हज़ारों झुठे वादे।
डॉ सुनीलम ने कहाकि फसल बीमा को किसान क्रांति की योजना बताया लेकिन इस योजना के नाम पर 22,000 करोड़ का प्रीमियम किसानो से वसूला गया और केवल 8,000 करोड़ का मुआवज़ा किसानो को दिया गया। डॉ. सुनीलम ने कहा की मोदी के झूठ को पूरी मज़बूती से झूठ कहा जाना चाहिए।
चंपारण सत्यग्रह शताब्दी यात्रा की एक सभा को संबोधित करते हुए सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अधक्ष डॉ. प्रेम सिंह ने कहा की देश में इस समय जो सरकार है वो कॉर्पोरेट घरानों के एजेंट का काम कर रहीं हैं। जनमुद्दों और समस्याओं से इन्हें कोई सरोकार नहीं।
समाज सेवी तनवीर आलम का कहना है की हमारा उद्देश सरकार की तरह खानापूर्ति नहीं है हम साफ़ मंशा से निकले हैं और लोगों के बीच जा कर संवाद कर रहे हैं। देश में इस वक़्त सब से ज़यादा ख़तरा सच बोलने पर है ,दाभोलकर हो या गौरी लंकेश सब के लिए कहीं न कहीं से कोई गोडसे निकल आता है। मारे जाने की धमकिओं का डर है, खौफ का साया बना हुआ है ,ऐसे समय में गांधी के विचारों को जीना कितना मुश्किल है जब कोई बत्तख मियां मौजूद नहीं है जो हमे बता सके की दूध के गिलास में ज़हर है।
तारिक इक़बाल, पटना