2002 में पत्रकार सो रहा था और आज सिनेमा हॉल में बैठकर गुरमीत की फिल्म MSG देख रहा है!

2002 में पत्रकार सो रहा था और आज सिनेमा हॉल में बैठकर गुरमीत की फिल्म MSG देख रहा है!

डेरे में लड़कियों का यौन शोषण कबसे और कबतक किया गया, ये सिर्फ गुरमीत जानता है। गुरमीत के गुलामों के घर की लड़कियां अगर मुंह खोलने की हिम्मत जुटातीं तो कोई यक़ीन नहीं करता।

एक लड़की ने अपने भाई की मदद से गुमनाम चिट्ठी लिखकर इस मामले का खुलासा किया तो उसकी हत्या कर दी गई।

चिट्ठी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यालय तक भेजी गई लेकिन उसका संज्ञान लेना मुनासिब नहीं समझा गया।

फिर एक छोटे अख़बार के संपादक राम चंद्र छत्रपति जो बेईमान और बिकाऊ नहीं थे, ने उस चिट्ठी को शब्दश: अपने यहां छापा तो उनकी भी हत्या करवा दी गई।

इस बीच पुलिस अधिकारियों को भी ख़ुराक़ पहुंचा दी गई थी।

इसके बाद पीड़ित लड़की और मारे गए पत्रकार के घरवालों ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और मामला सीबीआई को सौंपा गया।

मगर इस दौरान हरियाणा के बड़े अख़बार और उनके लिए काम करने वाले पत्रकार क्या कर रहे थे? क्या वे मर गए थे या बिक गए थे?

2002 में तो निजी चैनल भी बाज़ार में आ गए थे। आजतक चौबीस घंटे के ‘वॉचडॉग’ वाली भूमिका में था। क्या उसके पत्रकारों के लिए गुरमीत के कारनामे ख़बर नहीं थे?

मीडिया ने अगर तभी गुरमीत पर शिकंजा कस दिया होता तो आज हरियाणा में जान-माल का नुकसान नहीं हो रहा होता। मगर तब पत्रकार सो रहा था और आज सिनेमा हॉल में बैठकर गुरमीत की फिल्म MSG देख रहा है या फिर उसका रिव्यू लिख रहा है।

पत्रकार आज जिस तरह की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उन्हें इसका अनुभव या आदत नहीं है। इसीलिए आज टीवी देखते हुए ऐसा लगा कि मानों इराक़ी सेना और इस्लामिक स्टेट के बीच मोसुल में जंग निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और पत्रकार जान पर खेलकर अपने पेशे का धर्म निभा रहा है।

मगर सच यही है कि मीडिया ने अपराधी को सही वक़्त पर उसके अंजाम तक नहीं पहुंचाया, उसने अपने पेशे से समझौता कर लिया और इस दौरान गुरमीत ने अपने लाखों गुलाम बना लिए। आज उसके गुलाम खुलेआम गुंडागर्दी कर रहे हैं। क़ानून का डर या अदालत के फैसले के सम्मान की उनसे उम्मीद तो भूल ही जाइए।

हमारी पत्रकारिता अगर भ्रष्ट नहीं हुई होती तो गुरमीत 2002 में ही जेल की सलाखों के पीछे होता। मगर शुक्र मनाइए कि हमारी जांच एजेंसियां और अदालतें अभी पूरी तरह भ्रष्ट नहीं हुई हैं जिन्होंने बेहद शानदार तरीक़े से इस केस की तफ़्तीश की और गुरमीत को उसकी औक़ात दिखाई।

  • शाहनवाज़ मलिक 

 

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