‘जब महज 12 की उम्र अकबर ने हिन्दू शाशक हेमू को युद्द के मैदान में दी थी शिकस्त’

मुगलकालीन भारत में एक हिन्दू व्यापारी भी दिल्ली के तख़्त पर बैठ चुका है। 27 जनवरी 1556 में हुमायूं की मौत के समय हेमू एक व्यापारी से सूरी हुकुमत के प्रधानमंत्री बन चुके थे। सूरी हुकुमत में अधिकतर अफगान सैनिक थे लेकिन हेमू की सैनिको के लिए लाभकारी फैसलों से उसका रसूख सेना में सूरी शासक आदिलशाह से ज्यादा हो चुका था।

आदिलशाह को इतिहासकार एक निकम्मा शासक मानते है इसलिए सत्ता का केंद्र हेमू बनकर उभरे। हुमायूँ की मौत के बाद हेमू ने दिल्ली से मुगलों को हटाने के अहद के साथ सूरी सेना का अभियान चलाया। उन्होंने आगरा और दिल्ली में मुगलों को हराया।

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बता दें कि दिल्ली में कब्ज़े के बाद हेमू ने अपने को प्रधानमंत्री से आगे का शासक होने का एलान कर दिया। जो कि विक्रमदित्य की उपाधि धारण करते है। हेमू के पास अब एक बड़ी सेना हो चुकी थी। उनके लश्कर में 1500 से अधिक हाथी थे लेकिन उनकी हुकुमत महज़ कुछ महीनो में समाप्त हो गयी।

5 नवम्बर 1556 में पानीपत के युद्द में मुगल बादशाह अकबर की तरफ से बैरम खान के द्वारा हेमू को युद्द के मैदान में शिकस्त दी। जिसके फलस्वरूप जंग का निर्णय मुगलों के पक्ष में आया और हेमू की जंग में मौत हो गयी। जिस समय पानीपत की जंग हुई उस समय अकबर की उम्र सिर्फ 12 साल थी। लेकिन सेनापति बैरम खान ने इस युद्द में हेमू को हराकर एक बार फिर मुगलों को भारत में स्थापित कर दिया।