हैदराबाद २४। जुलाई : ( नुमाइंदा ख़ुसूसी ) : मस्जिदों के शहर हैदराबाद में फ़न तामीरकी शाहकार वसीअ-ओ-अरीज़ मसाजिद रमज़ान उल-मुबारक के दौरान तंग दामिनी का शिकवा करती नज़र आती हैं । इस माह-ए-मुबारक में फ़र्र ज़िंदाँ इस्लाम की कसीर तादादमसाजिद का रुख करते हुए बारगाह रब अलाज़त में सजदा बसजूद हो कर अपने रब ज़वालजलाल और प्यारे प्यारे नबी ई को राज़ी करने की कोशिश करते हैं ।
यही वजह है कि अल्लाह ताली अपने बंदों की इबादात-ओ-रियाज़ात सदक़ात-ओ-ख़ैरात और दीगर नेकियों से ख़ुश हो कर रहमतों और बरकतों की बारिश फ़रमाता है । जहां तक हैदराबाद की वसीअ-ओ-अरीज़ और ख़ूबसूरत मसाजिद का सवाल है इन में फ़तह दरवाज़ा और चन्दू लाल बारहदरी के दरमयान ( हम उसे बैरून फ़तह दरवाज़ा भी कह सकते हैं ) एक वसीअ-ओ-अरीज़ यानी आलीशान मस्जिद हकीम मीर वज़ीर अली भी शामिल है । वक़्फ़ रिकार्ड के मुताबिक़ 17889 मुरब्बा गज़ अराज़ी पर मुहीत इस ग़ैरमामूली मस्जिद में बह यक वक़्त सात हज़ार से ज़ाइद मुसल्ली नमाज़ अदा करसकते हैं । इस मस्जिद को पुराना शहर में अहलसन्नत अलजमाअत का मर्कज़ भी कहा जाता है ।
दरअसल इस मस्जिद की तामीर1851 में की गई लेकिन बाद में बार बार उस की तज़ईन नौ और तामीर-ए-नौ की जाती रही और जिस का सिलसिला आज भी जारी है । बताया जाता है कि ये मस्जिद नवाब मीर महबूब अली पाशाह के शाही हकीम , हकीम वज़ीर अली से मौसूम है । इस मस्जिद की ख़ूबसूरत तामीर और इंतिज़ामात को देख कर राक़िम उल-हरूफ़ ने सोचा कि क्यों ना क़ारईन को इस मस्जिद के बारे में वाक़िफ़ करवाया जाय । चुनांचे हम ने मस्जिद के मोतमिद मुहम्मद निसार अहमद से बातचीत की । उन्हों ने बताया कि 20 साल क़बलमस्जिद हकीम वज़ीर अली की तामीर-ए-नौ का आग़ाज़ हुआ था और अल्हम्दुलिल्ला आज भी इस मस्जिद की वक़फ़ा वक़फ़ा से तज़ईन का काम जारी रहता है ।
मस्जिद के निचले हिस्सा में दस हज़ार इसको आवर फिट पर तामीर की गई पहली मंज़िल में भी 10 हज़ारमुरब्बा फिट पर नमाज़ का एहतिमाम किया जाता है । जब कि सहन 18 हज़ार इसकोआवर फ़ुट या मुरब्बा फिट पर फैला हुआ है । नीचे और पहली मंज़िल पर जुमला 7 हज़ार मुस्लियों की गुंजाइश फ़राहम की गई है । मस्जिद में ख़ास बात ये है कि यहां ख़ुसूसी डीजीटल साउंड सिस्टम रखा गया है और अमरीका-ओ-जर्मन के सूती आलात नसब किए गए हैं । इन आलात की ख़ुसूसीयत ये है कि पहली सफ़ में जो आवाज़ मुसल्ली को सुनाई देती है इसी तरह की आवाज़ मुसल्ली को आख़िरी सफ़ में भी सुनाई देती है । फ़ासिला दूर होजाने के बाइस आवाज़ की शिद्दत या उतार चढ़ाॶ में कोई कमी नहीं आती ।
इस साउंड सिस्टम का मीनटननस बैंगलौर की एक कंपनी देखती है । अहम बात ये है कि ये मस्जिद सिर्फ मुस्लमानों के तआवुन से तामीर हुई है । फ़न तामीर के लिहाज़ से भी ख़ूबसूरत मसाजिद में इस मस्जिद का शुमार किया जा सकता है । अंदरूनी हिस्सा बहुत ख़ूबसूरत है और मिंबर के पास आयात करानी को ग़ैरमामूली अंदाज़ में तहरीर करते हुए दीवारों परनसब करवाया गया है । अबदालाज़ीम साहिब ख़त्तात ने बड़े ही ख़ूबसूरत अंदाज़ में और मेहनत से ये आयात करानी तहरीर किए हैं । मस्जिद के कारपटस भी देखने से ताल्लुक़रखती हैं जब कि मस्जिद की मीनारों और ख़ूबसूरत गनबदों को रास्ते से गुज़रने वाले लोग देखते हुए गुज़रते हैं ।
इस मस्जिद के आरकीटकट ख़ैर उद्दीन सिद्दीक़ी मरहूम हैं । जनाब मुहम्मद निसार अहमद ने मज़ीद बताया कि हाल ही में मुस्लियों की सहूलत के लिए एकग़ैरमामूली वुज़ू ख़ाना तामीर किया गया है जिस में बह यक वक़्त 70 मुसल्ली वुज़ू बना सकते हैं ।
22 तहारत ख़ाने हैं और मस्जिद में दाख़िल होने के लिए तीन बड़े बड़े बाबअलद अखिला नसब किए गए हैं । यहां जुमा की नमाज़ तीन बजे अदा की जाती है । ख़ुतबा जुमा मौलाना डाक्टर सय्यद वक़ार पाशाह देते हैं । वो अपने इलमी और वलवला-ओ-फ़िक्र अंगेज़ ख़िताब के लिए मश्हूर-ओ-मारूफ़ हैं ।
डाक्टर मौलाना वक़ार पाशाह ज़्यादा तर सीरत नबी ई और बुज़्रगान-ए-दीन – के वाक़ियात ब्यान करते हुए फ़र्र ज़िंदाँ इस्लाम के दिलों को गर्मा देते हैं । खासतौर पर जुमा को तो शहर के कोने कोने से लोग इस मस्जिद में नमाज़ की अदायगी के लिए आते हैं । मस्जिद में साफ़ सफ़ाई का ग़ैरमामूली इंतिज़ाम है और ये कोई मुम्किना हद तक मस्जिद की ख़िदमत की कोशिश करता है । मस्जिद कमेटी ने मस्जिद के सहन और अतराफ़ में शजरकारी भी की है । चंद दिन पहले ही तीन गनबदें तामीर की गईं और उन पर रंग-ओ-रोगन का कुछ काम बाक़ी है ।
इस मस्जिद में नमाज़ तरावीह में इमाम मस्जिद हाफ़िज़ मुहम्मद बशीर निज़ामी कामिल जामिआ निज़ामीया तीन पारा सुना रहे हैं । इमाम साहिब ही 5 वक़्त की नमाज़ें और नमाज़ जुमा पढ़ाते हैं । इस वसीअ-ओ-अरीज़ मसाजिद में साफ़ सफ़ाई के लिए 8 लोग ख़िदमात अंजाम देते हैं जब कि दो मोज़न भी हैं । तरावीह में भी दूर दूर से लोग आते हैं । आख़िरी दहिय में तहज्जुद का इंतिज़ाम किया जाता है । चूँकि मस्जिद बहुत बड़ी है इस लिए अक्सर-ओ-बेशतर यहां निकाह की महफिलें भी मुनाक़िद होती हैं । बहरहाल जो लोग भी शहर की इस ख़ूबसूरत मस्जिद और मुस्लिमो की ख़िदमत में मसरूफ़ हैं अल्लाह ताली उन्हें इंशाअल्लाह ज़रूर इस का बेहतरीन सिला अता फ़रमाएगा